वह फारसी और अंग्रेजी के विलक्षण विद्वान थे। राष्ट्रीयता उनकी नस-नस में कूट-कूटकर भरी थी। वह किसी प्रांतीय भाषा के प्रचार के लिए अपने राजनैतिक और राष्ट्रीय महत्त्व को कदापि दांव पर न लगाते। ताजा उदाहरण आचार्य विनोबा भावे का है। लोकमान्य तिलक के प्रयत्नों से मराठी की लिपि देवनागरी बन गई। विनोबाजी शेष भारतीय भाषाओं की लिपि देवनागरी करने में अहर्निश प्रयत्नशील थे। विनोबाजी उत्तम कोटि के तत्ववेत्ता और विचारक ही नहीं, मराठी के सुप्रसिद्ध लेखक भी थे। उन्हें हिन्दी के झमेले में पड़ने की क्या आवश्यकता थी !

लेकिन उनका कहना था कि हिन्दी के उपकारों को वह कभी नहीं भूल सकते-''यदि हिन्दी भाषा का आधार न होता तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक और असम से केरल तक के गांव-गांव में जाकर भूदान, ग्रामदान का क्रांतिकारी संदेश मैं नहीं पहुंचा सकता था। इसलिए हिन्दी भाषा का मुझ पर उपकार है और हिन्दी भाषा ने मेरी बहुत सेवा की है। अगर मैं मराठी भाषा लेकर जाता तो महाराष्ट्र से बाहर काम नहीं होता।''
आज की राजनीति में तो विनोबा-वाक्य भी प्रमाण नहीं रहे। यदि भारत में अंग्रेजी के समर्थकों को अंग्रेजों के कथनों और क्रिया-कलापों से ही सदबुद्धि आती हो तो उन्हें यह जानना चाहिए कि भारत में ईसाई धर्म का प्रवर्तन करने के लिए और यहां की प्रजा से अपना संपर्क स्थापित करने के लिए तत्कालीन अंग्रेज शासकों ने हिन्दी के कोश, व्याकरण और लेखन का निर्माण प्रारंभ करा दिया था। यह काम उन्होंने हिन्दी-प्रदेश में या दिल्ली को अपनी राजधानी बनाकर नहीं, वरन् बंग प्रदेश में, जब उनकी राजधानी कोलकाता थी, तभी उन्होंने हिन्दी को राष्ट्र की भाषा के रूप में अपना लिया था। हिन्दी के महत्व और शक्ति को प्रकट करने वाले प्रसिद्ध अंग्रेज विद्वान् डॉ. ग्रियर्सन के ये वचन क्या आज के अंग्रेजीदां लोगों की आंखें खोल सकेंगे- ''जिन बोलियों से भी हिन्दी का निर्माण हुआ हो, वह मानव-मस्तिष्क के किसी भी विचार को स्फटिक-सदृश स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त करने के लिए समर्थ है और पांच सौ वर्षों से रही है। हिन्दी का अपना वृहद् शब्द-भंडार है और गूढ़ विचारों को प्रकट करने के लिए भी उसके पास पूर्ण साधन हैं।''