राजनीतिक दलों और विदेशी एजेंटों का चहेता। उसी की आज़ादी पर अखबार की आज़ादी निर्भर है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आंदोलन भी सिर्फ इसी वर्ग के लिए है। अगर मैं वह होगया होता, तो मेरी कहानी भी कहने और सुनने योग्य बन जाती।
मैं आपको अच्छी तरह जानता हूं कि आप ऐसे रोग के रोगी हैं, जो अपना ध्यान एक जगह केंद्रित नहीं कर सकते। दैनिक पत्रों, साप्ताहिकों और मासिकों में आपकी रुचि सिर्फ इतनी ही रह गई है कि चलते-फिरते उनके शीर्षक देख लिए, कला के नाम पर कोई नंगी-अधनंगी तस्वीर मिली तो उसे घूर लिया, कहीं कोई निंदा-रस प्राप्त हुआ तो उसकी चुस्की ले ली और जुट गए बैल की तरह

जीवन के कोल्हू में। मरीज़ अच्छा हो या न हो, मरे या तड़फड़ाता रहे, मेरे हाथ कलम का इंजेक्शन लग गया है, मैं उसे आपको ठोकूंगा ही। क्योंकि मैं यह भी जान गया हूं कि आपकी सहनशक्ति बड़ी अदभुत है। कितनी महामारियां इस देश में आईं, आप बच ही गए। हर साल सूखा, बाढ़, लू और शीतलहर आती है और चली जाती है, फिर भी आप जिंदा हैं। अन्याय, जुल्म और सितम तो आप हजारों वर्षों से सहते रहे हैं। आपने अंग्रेज भी सहे और अंग्रेजी भी सह रहे हैं। आपको पराधीनता का भी अहसास है और आज की स्वतंत्रता का भी, आपात्काल में भी आप शांत रहे और मंहगाई, मुद्रास्फीति तथा लूटमार और बलात्कार भी आपको क्लांत नहीं कर सके हैं। आपकी स्थितप्रज्ञता को नमस्कार करते हुए मैं अपनी कलम उठा रहा हूं।
कहीं आप दोष निकालने लगें, इसलिए पहले स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि पढ़ाई के नाम पर मुझे मिडिल का भी सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं। न मैंने पूरी तरह गांधी को पढ़ा है और न मार्क्स को। पूंजी एकत्र करने की तमन्ना आपकी तरह मेरे मन में भी अवश्य रही है, लेकिन न मेरे पास साहित्य की पूंजी है और न पूंजीवाद का तत्वज्ञान ही है। पंडितजी के घर में पैदा हुआ हूं, पर संस्कृत का पंडित नहीं। मुस्लिम जनसंपर्क साधा है, लेकिन उर्दू अदब में मेरी पैठ नहीं। बाबू श्यामसुंदर दास, बी.ए., बाबू गुलाबराय, एम. ए. और अंग्रेजी पढ़ाते-पढ़ाते हिन्दी के डॉक्टर बने नगेन्द्र के साथ मेरी अच्छी-खासी बनी है। पत्रकारिता के पच्चीसों प्रकाश स्तंभों जैसे नेशनल हेरल्ड के चेलापति राव, मालिक संपादक या हिंदुस्तान टाइम्स के दुर्गादास, इंडियन एक्सप्रेस के मुलगांवकर,