अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

प्रेमी के पैर चारपाई से बांध दिए जाएं और प्रेमिका के हाथ छतरी के खंभे से। पहले यह प्रयोग चौबीस घंटे के लिए किया जाए। इस बीच मरीज़ों को न खाना मिले, न पानी। उनसे कहा जाए कि हां, अब आहें भरो और ताजमहल को देखकर हिचकियां लो। ख़याल यह है कि चौबीस घंटे के इस उपचार से प्रेम के कीटाणु काफी काबू में आ जाएंगे। यदि इस डोज़ से लाभ न हो तो किसी एक प्रेमी और प्रेमिका के जोड़े का बिस्तर मुमताज महल और शाहजहां की कब्र की बगल में अलग-अलग लगा देना चाहिए और गुंबद के नीचे से उनसे कहना चाहिए कि हां, अब लगाओ आवाज़ें। एक कहे- 'हां, प्यारी'। दूसरा कहे- 'हां, प्यारे'। गुबंद से आवाज़ें टकराएं। नीचे लेटकर वही स्वर सुनाएं और नीचे फिर सदाएं जाएं-'हे प्यारी, हे प्यारे'। ये नज़ारे पूरे आठ घंटे तक चलने चाहिए। डॉक्टरों को पूरी हिदायत रहे कि रोगी कहीं आवाज़ लगाना बंद न कर दे। कहीं पानी न मांग जाए। हमारा विश्वास है, यह दूसरी डोज़ प्रेमियों के दिमाग को दुरुस्त करने में मुफ़ीद साबित होगी। लेकिन अगर बीमारी तीसरी स्टेज पर पहुंची हो तो उसका तीसरा इलाज इस प्रकार होना चाहिए। वह यह कि दोनों प्रेमी-प्रेमिका के बिस्तर ताजमहल की दोनों दिशाओं में लगा दिए जाएं- और उनसे कहा जाए कि वे दिन में ताजमहल के पत्थरों और रात में उनमें जड़े हीरों को गिना करें और सुना करें दिन में कौवों और रात में उल्लुओं की आवाज़ें, और जमुना-पार के गीदड़ों का शोर जो उन्हें प्रेम-डगर में 'वन्स मोर' करने से अवश्य ही खींच लाएगा और वे अपने वार्डरों से कह उठेंगे-"नो मोर, प्लीज नो मोर''। हम प्रेम से बाज आए। भाड़ में जाए शाहजहां और ऊपर से उनकी मुमताज महल। हम प्रेम नहीं, काम करना चाहते हैं। मरना नहीं, जीना चाहते हैं। लेकिन इस पर भी किसी प्रेमी की अक्ल ठिकाने न हो तो उसे ताजमहल से कुछ दूर बिल्लोचपुरा में पागलखाने में तब तक के लिए भेज देना चाहिए, जब तक वह प्रेम के लिए दोनों कान पकड़कर तौबा न कर ले !
इसलिए हमारी समझ से ताजमहल को केवल पुरातत्व की विशेष कलाकृति मानकर, उसे संसार का आठवां आश्चर्य जानकर, उसको सींचे-सहेजे जाना ठीक नहीं। उसका जनता के लिए उपयोग होना चाहिए। यदि वास्तव में प्रेम की समाधि है, तो यहां प्रेमियों का इलाज होना चाहिए। अगर यह शाहजहां और मुमताज महल के प्रेम का प्रतीक नहीं है और सिर्फ मुमताज महल की आकस्मिक मौत और शाहजहां की बेबसी का नमूना है तो हर माशूका को यहां आकर अपनी मौत और हर आशिक को यहां आकर अपनी बेबसी का अहसास करना चाहिए। हमारा ख़याल है कि अगर प्रेम के रोग में माशूक को अपनी मौत और आशिक को अपनी बेबसी का ठीक-ठीक अहसास हो जाए, तो सौ में से निन्यानबे तक इस प्रेम के चक्कर में से निकल सकते हैं। ताजमहल नवयुवकों और नवयुवतियों के लिए यह शिक्षा और यह सुविधा सहज ही प्रदान कर सकता है। इसीलिए हमें ताजमहल को प्रेम-रोग के उपचार का एक अंतर्राष्ट्रीय अस्पताल बना देना चाहिए।
कल्पना कीजिए कि अगर ताजमहल में ऐसा अस्पताल खुल गया होता तो क्या होता ? तब ताजमहल में कुछ दूसरे ही नज़ारे होते। वहां की नक्काशी के कुछ और ही इशारे होते। यहां के पेड़-पौधों, लता-कुंज, गुंबदों-मीनारों का कुछ अलग ही इतिहास होता। वहां के पंछियों की बोली बदल गई होती और उसे देखने को

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