'फारेन एक्सचेंज' यानी विदेशी मुद्रा भारत में खिंची चली आती। खोजी लोगों के दल तब हिमालय में यति ढूढ़ते ही नहीं, ताजमहल में सच्चे प्रेमी को तलाश करने के लिए अपने-अपने घरों से निकल पड़ते।
चिकित्सा-शास्त्र में तब एक नया अध्याय जुड़ जाता। मनोविज्ञान के प्रेम-तत्त्व की पहली प्रयोगशाला के रूप में ताजमहल की दुनिया में ऐसी ख्याति फैलती कि संसार के वैज्ञानिक अंतरिक्ष की यात्रा भूलकर, भारत की यात्रा को उड़ पड़ते। कहते कि चंद्रमा में क्या रखा है। चंद्रमुखियों के मन की पर्तों तक पहुंचने की कोशिश की जाती। मंगल में पहुंचने तक आपस में दंगल क्यों किया जाए ? जिन्होंने अपने जीवन को भरी जवानी में जंगल बना लिया है, उन प्रेमियों के दिल तक पहले पहुंचा जाए। संसार की संहारक शक्ति का ध्यान तब अणुबम से हटकर प्रेमनाशक कीटाणुओं या प्रेमवर्धक दूरमारकों की ईज़ाद में लगता-यानी दुनिया का नक्शा ही बदल गया होता। यानी आदम के बेटे को मिटाने के लिए ही नहीं, उसके कलेजे में कैंसर की तरह बढ़ते प्रेम के नासूर को कुरेदकर फेंकने के लिए तत्पर हो उठते। भले ही उन्हें इसके लिए खुद किसी के प्रेमपाश में फंस जाना पड़ता। क्योंकि महाकवि ग़ालिब के शब्दों में-
इश्क पर ज़ोर नहीं, है वह आतिश ग़ालिब।
जो लगाए न लगे और बुझाए न बने॥
पर लगाना और बुझाना तो तब होता, जबकि ताजमहल में अस्पताल बन जाता। अभी तो उसमें न ताज है, न महल, फालतू लोग वहां बेकार चहल-पहल किया करते हैं।
दुनिया आज से भी ज्यादा मचल गई होती। लोग तब पत्थरों को देखने नहीं आते, वे देखने आते नवीनतम-कोमल प्रेमियों को और पत्थर-दिल प्रेमिकाओं को। वे सोचते, हमने कलकत्ता के चिड़ियाघर में गैंडा देखा है, दिल्ली में भालू के दर्शन किए हैं। लखनऊ का मुर्गा भी खूब है। अब चलो, ताजमहल में चलकर उस जंतु को भी देख आएं जिसे लोग 'प्रेमी' कहते हैं। सुनते हैं उसके भी आदमियों के-से हाथ-पैर हैं। आंख-कान हैं। मुंह-बोली है। पर उसका आचरण- देखकर भी नहीं देखता। सुनकर भी नहीं सुनता। उसे न सुध है न बुध। न उसे पागल कहा जा सकता है, न आदमी। न उसे रोगी कहा जा सकता है, न स्वस्थ। क्या अज़ब बात है, उसके रोने और गाने में कोई फर्क ही नहीं है।
ऐसे जंतु विशेष को देखने के लिए देश क्या, दुनिया उमड़ पड़ती। टिकट लग जाता। सरकार की आय बढ़ जाती।
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
पृष्ठ-5
|