कहता हूं कि ऐसा करना मेरे साथ नहीं, मेरी महान पति-बिरादरी के साथ भी अन्याय का कारण होगा। आप न जाइए यू.एन.ओ., न बैठाइए जांच कमीशन, न कीजिए पंच फैसला, खुद ही अपनी-अपनी अक्ल पर थोड़ा ज़ोर डालकर सहानुभूति से इस मसले पर विचार कीजिए, तो मेरी बात को सच पाइएगा।
उदाहरण के लिए, मैं कोई चार सौ रुपये महीने पगार पाता हूं। पहली तारीख़ को मुझे सीधा घर पहुंचने की हिदायत है। कह दिया गया है कि तनख्वाह लाकर सीधे पहले घर में देनी चाहिए, धोबी, कैंटीन और रेस्तरां के बिल सब वाहियात हैं। अगर न भी हों तो उनके बिल पहले होम-मिनिस्ट्री में मंजू़र होने चाहिए। साल में गिनकर दो बार मेरे कुर्ते-पायजामे सिलवाए जाते हैं और होली-दशहरे से पहले अगर वे जवाब भी दे जाएं तो उनके लिए अलग से रकम मंजू़र नहीं होती। दफ्तर जाते समय दोपहर बाद नाश्ते का सामान कैरियर में लटका दिया जाता है। गिनती के चार पान डिब्बी में रख दिए जाते हैं। छोटी-छोटी चार इकन्नियां जेब में डाल दी जाती हैं और शाम को लौटने पर पूछ लिया जाता है कि वह चार आने पैसे किसमें खर्च कर दिए ?
रात को नौ बजे सोने और सुबह छः बजे उठने की मुझे सख्त ताकीद है। ज़ोर से हंसने, सिर उठाकर चलने, इधर-उधर बैठने और अंटसंट किताबें पढ़ने की मुझे मनाही है। ज्यादा चाय पीने, देर से घर लौटने और कभी सिनेमा-थियेटर का ज़िंक्र करने पर खास तौर की सजाएं निश्चित की हुई हैं। तय है कि महीने के पहले सप्ताह के प्रथम शनिवार को उनके साथ सिनेमा जाना है। खेल और क्लास का चुनाव वह स्वयं करती हैं। चलते वक्त उन्हें क्या पहनना है और मुझे क्या पहनना है, इसका फैसला उन्हीं के हाथ में है। यह आज सोलह वर्ष से मुझे निरंतर बताया जा रहा है। सख्त़ आदेश है कि खेल से पहले का समय उनसे बातें करने में और खेल के समय अपना ध्यान मुझे पर्दे पर ही लगाए रखना चाहिए।
मुझे किस-किस प्रकार के और किन-किन लोगों से दोस्ती रखनी है, कैसे-कैसे लोगों के घर जाना है और किन-किन को घर बुलाना है। उनकी सूचियों के विषय में मुझे बातें करने, देखने और सोचने तक की मनाही है। घर के मसाले तक मुझे ही लाने पड़ते हैं। मगर उनकी सूची और भाव मुझे पहले से लिखकर दे दिए जाते हैं और उनसे कम-बढ़ होने पर बड़ी कैफ़ियत ली जाती है। लेकिन, बाक़ी मार्केटिंग का काम वह स्वयं करना पसंद करती हैं। मुझे बार-बार हंसकर समझा दिया गया है कि उनकी पसंद की हुई, खरीदी हुई चीजों की सिर्फ तारीफ़ ही करूं। न उनके नाम पूछूं, न दाम ! मान लिया गया है कि मुझे लेटेस्ट फैशन का ज्ञान नहीं। यह भी तय होगया है कि मैं और पतियो की तरह अधिक नहीं कमा सकता और यह भी कि मेरे पल्ले पड़कर उनकी ज़िदगी तबाह होगई है। अब ज़िंदगी किसकी खराब हुई है, इसका फैसला आप खुद करें। खुदा के लिए इस प्रश्न को वर्ग-संघर्ष का, बिरादरी का या अपने मान-अपमान अथवा स्वार्थों और हितों का न बना दें। यह भी सोचें कि पति भी आख़िर मनुष्य है। भगवान ने उसे भी दिल और दिमाग दिया है। इस नई रोशनी ने उसमें भी तमन्नाएं भर दी हैं। वह भी दूसरों की तरह न्याय का हकदार है।
ज़रा खुद ही ठंडे मस्तिष्क से सोचिए कि अन्याय पति के साथ हो रहा है या पत्नी के साथ ? खर्च पति पर ज्य़ादा हो रहा है या पत्नी पर ? आराम से पति अधिक है या पत्नी ? अगर आपने घर में ही इस मसले को हल नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब पति लोग पत्नियों के दमन के विरुद्ध बगावत कर देंगे और पत्नियों की इस मीठी नादिरशाही को ख़त्म करने के लिए उनका नारा होगा, "दुनिया के पतियो, एक हो जाओ।''
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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