के मल्ल अभी तक नहीं मरे। मल्ल पट्ठों से कहता, "देखते क्या हो, यह हमारे जिजमान हैं। उठाओ इनका सामान और लदवाओ तांगों में। हम भी देखते हैं इन्हें कौन ले जाता है ?'' कि तभी कृष्ण भगवान को वहां बातों ही बातों में स्टेशन पर लाठियां चलती नज़र आतीं। कुछ फूटते, कुछ फटते। कुछ बकते, कुछ सकते। कुछ मारते, कुछ रुकते। इस हंगामे को पुलिस आकर संभालती और कृष्ण सोचते अब क्या किया जाए ? कहां चला जाए ? हमने तो सोचा था कि महाभारत-प्रकरण हम समाप्त कर चले। ब्रज में घुसते ही यह सूचना कैसी ? भगवान कृष्ण को मथुरा एकदम बदली हुई नज़र आती।
उन्हें रथों के स्थान पर रिक्शा, घोड़ों के स्थान पर आदमी, राजपथों के स्थान पर छोटी-छोटी तंग गलियां, वृदांवन की जगह मंदिर ही मंदिर और गोकुल में कपिला गायों का नाम-निशान न पाकर बड़ी हैरानी होती। 
देखते कि यमुना अब वह नहीं रही। उसके कूल पर अब कंदब नहीं मिलते, झाऊ पलते हैं। कमलों की जगह यात्रियों को अब कछुए ही दिखाई देते हैं। उसके तट पर वेदपाठ के स्थान पर 'ले गया, ले गया, मारियो रे, दौड़ियो रे !' अधिक सुनाई देता है। वह देखते कि मथुरा के मनुष्य ही नहीं, यहां के बंदर भी चोरी-ठगी में बड़े-बड़ों के कान
काटते हैं। कृष्ण भगवान मथुरा आते तो उन्हें भी अपने मंदिरों के दर्शन अवश्य कराए जाते और जब उन्हें टैक्स ले-लेकर यह बताया जाता कि यहां वह पैदा हुए थे, यहां उन्होंने मल्ल मारे थे, यहां कुब्जा मिली थी, यहां कंस पछाड़ा था, यहां विश्राम किया था, यहां उनके गुरु रहते थे, तो वह खुद ही अपना माथा अवश्य ठोंक लेते। मंदिरों में मूर्तियों को देखकर भी उनके होश हिरन हो जाते। अपनी ठोड़ी पर चिबुक, नाक में बेसर, कान में कुंडल, हाथ में कंगन, पहुंची और बाजूबंद तथा पैरों में नूपुर देखकर वह सोचते कि मेरे भक्तों ने मुझे क्या बना डाला ? मथुरा पहुंचकर भगवान कृष्ण की यह बड़ी इच्छा होती कि तनिक माखन-मिश्री अवश्य चखी जाए और मिल जाए तो थोड़ी छाछ भी छकी जाए। लेकिन उन्हें यह जानकर हैरानी होती कि ब्रज के लोग माखन-मिश्री खाना तो दूर, उसका नाम भी भूल गए हैं। उन्हें कदम-कदम पर चाय और पान की दुकानें तो मिलतीं, मगर माखन-मिश्री की दुकान सारे शहर में एक भी नहीं दिखाई देती। बहुत खोजने पर उन्हें कागजों में लिपटा एक नमकीन-सा पदार्थ दिया जाता, लेकिन निश्चय ही कृष्ण इसे सूंघकर छोड़ देते। उनके युग में न मक्खन पीला होता था, न नमकीन, न वह कागजों में तुलकर आता था। न जाने यह क्या बला है ! अपने युग में भगवान कृष्ण ने चाहे अवश्य ही महाभारत युद्ध की अनेक गुत्थियां सुलझाई हों, लेकिन ब्रज में आकर वे खुद अपने जीवन से संबंधित इन समस्याओं को सुलझाने में अपने को असमर्थ पाते कि मथुरा से आकर वे गोकुल में पले थे, या वृदांवन में, नंदगांव में बड़े हुए थे कि मुहम्मदपुर (परासौली) में ? उनकी प्यारी राधा वृदावंन की थीं या बरसाने की, या राधाकुंड की ?
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