क्या छटीकरा में उनकी छटी हुई थी ? क्या सतोहे में उन्होंने सतुआ खाया था ? और दान-घाटी कौन-सी सही ? चीर-घाट कौन-सा ठीक है ? बंसीवट कहां है ? ये सब समस्याएं भगवान कृष्ण को विकल किए बिना न रहतीं।
पंडे लोग भगवान कृष्ण को गोवर्धन भी ज़रूर ले जाते। ले जाते क्या, कृष्ण वहां जाए बिना भी न रहते और निःसंदेह गिरिराज की तलहटी में जाकर वहां तृण, लता-गुल्मों, सर-सरोवरों, मानसी गंगा, चंद्र सरोवर, कुसुम सरोवर, राधा-कुंड, कृष्ण-कुंड को देखकर उनके खिन्न मन को थोड़ी प्रसन्नता भी प्राप्त होती, लेकिन "सब देवन कौ देवता गिरि गोवर्धननाथ" को देखकर वह अचंभे में पड़ जाते। यह तो मेरे ज़माने में सात कोस लंबे और सात कोस ऊंचे थे। देवता कहां बिलाय गए ? और तभी उनके मन में यह विचार आता कि यदि अब कहीं फिर से गोवर्धन को उठाने का प्रसंग उपस्थित हो जाए तो इस बार उन्हें सात कोस धरती में धंसे गिरिराज महाराज को ऊपर उठाने में काफी परिश्रम करना पड़ेगा।
गोवर्धन पहुंचकर उन्हें गोपियों की भी याद आए बिना न रहती, लेकिन वह यह जानकर हताश हो जाते कि ब्रज की गोपियां दही बेचने मथुरा जाती ही नहीं। अब उन्हें दूध जमाने, घी निकालने में लाभ नहीं रहता। वे तो सीधा दूध ही पानी मिलाकर दूधियों के हाथ बेच देती हैं। न दही जमे, न बेचने जाना पड़े। न माखन हो, न चोरी करने कोई आए।
गोपाल को ब्रज में गायों के स्थान पर भैंसें, मयूरों के स्थान पर मुर्गे और रास-नृत्य के स्थान पर नौटंकी या सिनेमा का ही शौक अधिक प्रचलित दिखाई देता।
योगेश्वर सोचने लगते, काल बड़ी तीव्र गति से प्रवाहित हो रहा है। मधुपुरी के लोग, ब्रज के वासी नहीं जानते कि वे किस ओर जा रहे हैं ? उनका इष्ट क्या है ? कर्त्तव्य क्या है ? कर्म क्या है ? वे मुझको, मेरे स्वरूप को, मेरी लीला को, माया को एकदम भूल गए हैं। कौन्तेय, उठ और कर्त्तव्य कर !
लेकिन कृष्ण देखते हैं कि कोई अर्जुन उनके गीता-ज्ञान को सुनने इस समय उनके पास नहीं है। उनका पंडा उनसे कह रहा है- महाराज, हाथ में जल लीजिए, गोत्र का उच्चारण कीजिए। कहिए, ब्रज-यात्रा पूर्ण हुई। यमुनाजी, विश्राम घाट छोड़ देओ।
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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