है कि उसके रचयिताओं का अर्थ के लिए आग्रह नहीं है।
हिन्दी में अमृतध्वनि छंद उसे कहते हैं जिसका बड़े से बड़ा पंडित आज कोई अर्थ नहीं निकाल सकता। इसी प्रकार आधुनिक युग में हिन्दी की सबसे श्रेष्ठ कविता यह है-
अड़म बड़म धड़म्
धतड़म् धतड़म्, धतड़म्
बादल गरजा, ताशे बाजे
पैसे लेकर कविजी ने कवि-सम्मेलन में कविता पढ़ी, तालियां पिटीं, जनता हंसी या "कुन्देन्दु तुषार हार धवला" सरस्वती सिर धुनकर रह गई। अब आप ही बताइए यह कविता बुरी है ? नहीं ! तो फिर बताइए इस कविता का क्या अर्थ है ? अर्थ अगर समझ में नहीं आया तो क्या अनर्थ होगया ? कविता का अर्थ से क्या संबंध ? कविता कविता है, अर्थ अर्थ है। अर्थ होता है 'निगेटिव' और कविता तो 'पोजिटिव' है ही। अब अगर दोनों तार आपने एक साथ पकड़ लिए तो करंट लग जाएगा न ?
तो हे पाठको, कविता के अर्थ को पकड़कर नाहक क्यों करंट खाते हो ? यदि कविता में माने न हों तो चंद पुराने लोग भले ही कुछ तानें सुनाने लगें, वरना आनंद ही आनंद है। न लिखने वालों को कष्ट, न पढ़ने वालों को मुसीबत, न सुनाने वाले को परेशानी और न सुनने वाले को हैरानी।
आदमी आज अर्थ का दास बन गया है। धर्म, समाज और राजनीति तीनों ही आज अर्थ से दूषित हो चुके हैं। हमें साहित्य को, कम-से-कम काव्य को तो अर्थ के प्रमाद से बचा ही लेना चाहिए।
यदि कविता में अर्थ न हो तो इससे अधिक कुछ नहीं होगा कि फिर हर कोई कविता लिखने लगेगा और कुछ खास लोगों की 'मोनोपॉली' टूट जाएगी। हमारा निवेदन है कि 'मोनोपॉली' किसी भी क्षेत्र में हो, टूटनी ही चाहिए। जब ज़मीन किसी एक की नहीं रही, जब संपत्ति किसी एक के पास इकट्ठी नहीं हो सकती, तब कविता के उत्पादन का अधिकार भी किसी एक के पास कैसे सुरक्षित रह सकता है ? जब हम देश की अर्थ-व्यवस्था को संतुलित और उदार करने जा रहे हैं, अर्थ का ठीक से मूल्यांकन और वितरण करने जा रहे हैं। तब हमें काव्य के अर्थ को भी दुरुस्त करना होगा।
यदि काव्य में अर्थ न हो तो उससे शायद एक और हानि होने की संभावना है। उसका कवि-सम्मेलनों पर शायद कुछ असर पड़े। अर्थात जो लोग अर्थ को समझकर सिर हिलाते हैं, वे सिर हिलाने की जगह मुंह बिचकाने लगें। लेकिन इससे कवियों को निराश नहीं होना चाहिए। हमारे देश में बिन समझे सिर हिलाने वालों की तादाद कुछ ज्य़ादा ही है। बहुमत तो एक वोट का भी जीत के लिए काफी होता है। यहां तो हजारों की संख्या में असमझ सराहने वाले हैं। आज कविता में अर्थ नहीं, तर्ज़ देखी जाती है। कला नहीं, गला देखा जाता है। शब्द नहीं, संगीत की सराहना होती है। अस्तु, कविता में अर्थ न होंगे तो युग-धर्म का निर्वाह ही होगा। समय के साथ तरक्की ही होगी। कल्याण ही होगा।
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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