सूरदासजी ने बीच में ही टोककर हमसे कहा, "लिखी तौ जाने कहा-कहा है। एक सूरदास मदनमोहन हू ह्वै गए एं। उनके पद हू लोगन नें मेरे 'सूरसागर' में छाप दए एं। कोऊ मोय सारस्वत कहै है, कोऊ ब्रह्मभट्ट बतावै ऐ। कोऊ मोय आगरे को कहै है। और अब तौ खैंचि कैं मोय ग्वालियर हू लै जाय रहे एं। पै ऐसी बात है नाहिं।''
"तो वास्तविकता क्या है, सूरदासजी ?''
"बात तो भइयाजी, बहुतेरी एं। पै संछेप में मोय इतनी ही कहनी ऐ के मैं वैष्णव हूं और महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी कौ सेवक हूं। मैंने जीवन-पर्यंत श्री गिरिराजधरण प्रभु की लीला गाई एं और मैं अंधौ नाहिं हतौ। मैंने दुनिया भली प्रकार सूं देखी हती।''
"फिर आपके विषय में यह सब प्रवाद कैसे फैला ? कुछ-न-कुछ तो बात होगी ही।'' हमने आश्चर्य से पूछा।
"बात तो केवल इतनी-सी हती, कै साठ बरस की उमर में मेरी एक आंख में मोतियाबिंद उतरि आयौ। वा जमाने में आजकल की नाईं, कहा कहें हैं वासो, आपरेसुन नाहिं होते हते। जा कारन मोहि कछु कम दीखबे लग्यौ। धीरै-धीरै दूसरी आंख हू पहली के वियोग में दूबरी होन लगी और दुष्ट लोग मोहे सूरदास कहिबे लगे।''
हमने सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा, "यह तो बहुत बुरा हुआ। मगर महाकवि, आज इस बात को कौन सच मानेगा ?''
सूरदासजी ने तुरंत उत्तर दिया, "मैंने याही कारन तो आपकूं फोन कियो है। मैं आपकूं कछू प्रमान देऊं हूं, तिनकूं तुम जगत में उजागर करौ।''
हम सांस रोककर सुनने लगे और सूरदासजी ने कहना शुरू किया, "हमने अपने एकु पद में स्वाफ-स्वाफ लिख्यौ है-
सूरदास की एकु आंखि है, ताहू में कछु कानो ।
का जाते बढ़िकै कोऊ और अंतर-साच्छ की आवश्यकता रहि जाय है ?''>
"परंतु सूरदासजी, इसका अर्थ तो विद्वान लोग भक्ति-परंपरा में आपकी अतिशय विनय के रूप में लेते हैं। कहते हैं कि सूरदास तो ज्ञान और भक्ति की दो आंखों में से केवल एक भक्ति की आंख से ही दुनिया को देखते हैं और वह भी थोड़ा-थोड़ा।''
"जिही तौ झींकबौ है। कै पढ़े-लिखे लोग बिना मतलब के अर्थ कौ अनर्थ करि डारै हैं। पहले मेरी आंखन तैं पानी कौ ढरका बहन लग्यौ हौ। ताही समै मैंने श्रीनाथजी कूं यह पद गायकैं सुनायौ, "निसि दिन बरसत नैन हमारे!''
लंबी सांस भर सूरदासजी आगे कहने लगे, "पै टेढ़ी टांग बारे नैं हमारी कोई सुनवाई नाहीं करी। तब काहू नैं हम ते कही, सूरदासजी, मथुरा सहर में एक मदनगोपाल नाम कौ आदमी ऐ। बु आंखिन के चसमा अच्छौ बनाय के देय है। तुम वा पै जाऔ।''
थोड़ा दम लेकर सूरदासजी ने आगे बताया, "भइयाजी, हम वा पै गए। ता के चसमा ते हमें कछु लाभ हू भयौ। पै एक दिना श्रीनाथजी के मंदिर ते उतरते समय वा चसमा को कांच गिर के टूटि परौ। हम फिर
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