कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

मथुरा पहुंचे। पै मदनगोपाल वहां ते अपनी दुकान छोड़िकें कहूं अनत चल्यौ गयौ हतौ। हमने वा समैं की अपनी अवस्था कौ वर्णन हू एक पद में कियौ है।''
"क्या ?'' हमने पूछा। और सूरदासजी ने हमें वह सुनाया-
नैंना भए अनाथ हमारे !
मदन गुपाल वहां ते सजनी,
सुनियत दूर सिधारे !

"आप तौ खुद्द जा बात कूं भली प्रकार ते जानौ हौ कै चसमा बारी आंखि बिना चसमा के कैसी अनाथ है जाय है। मदनगुपाल के पाछे हमें कोऊ दूसरा चसमा बनायबे बारौ मिल्यौ नाहिं हतौ। जा ते हमें श्रीजी के दरसन करिबे में बड़ी अटक हैबे लगी। वा समै कौ हू एक पद हमारे सूरसागर में है, "अंखियां हरि-दरसन की प्यासी !'' जा पद कूं तुम फिरि कैं पढ़ियों। हमारी व्यथा भली प्रकार सूं आपकी समझ में आय जाएगी।''
हम क्या कहें और क्या न कहें, यह सोचते ही थे कि सूरदासजी पुनः बोले,"लाला, तुम खुद्द अपनी अकल ते सोचौ कै जो हमारे आंखि नाहिं हती तौ हम गिरिराज पर्वत ते दो समै उतरि कै दो कोस पारासौली कैसे जाते हे। अंधौ आदमी कहूं अकेलौ पहाड़ पै रोज चढ़ि-उतरि सकै है ? और 'वार्ता' को ई लिखौ प्रमान हौ तो वार्ता में तौ एकु स्थान पै ऐसौ हू लिख्यौ है कै सूरदास मंदिर के काम ते कबहु-कबहु मथुरा आयौ-जायौ करते हे। सो तुमही कहौ, अंधे आदमीन के सिपरद कबहू बारह कोस दूरि जाइके मंदिर के प्रबंध कौ काम सौंपो जाय ऐ ?''
एकाएक हमारे ध्यान में सूरदास का प्रकृति-वर्णन, रंगों की छटा, बालकृष्ण की थिरकन, उनका 'हरि पालने झुलावै' वाला पद बिजली की तरह कौंध गया। निस्संदेह मानव के रूप-रंग का ऐसा सूक्ष्म वर्णन करने वाला कवि कहीं अंधा हो सकता है !
सूरदास ने कहा, "हमें अपने जीवन में ई जा बात कौ कछु-कछु आभास है गयौ हतौ कै लोग हमें सूझतौ नाहिं कहेंगे। जाते हमने देह छोड़िबे तें पहले हू गुसांईजी के सामनें आंखिन की ही चर्चा करी -
खंजन नैन रूप-रस माते !
चलि-चलि जात निकट स्रवननि के,
उलटि-पलटि ताटंक फंदाते।
'सूरदास' अंजन-गुन अटके,
नतरु अबहि उड़ि जाते !

"भइयाजी, जा कौ मतलब जि है कै एक समय हमारी रसिक आंखें खंजन के समान हतीं। वे इतेक लंबी हतीं कै कानन तक उनके कौने पहुंच्यौ करते हे। वह इतनी बड़ी और चंचल हतीं कै जो हम बिनु में काजर नांय लगाते तो निकस ही पडतीं। बस, जाते आगें हम आपते और का कहें ? तुम खुद्द बहौत समझदार हौ। हिन्दी के काहू सोध करिबेवारे तक हमारी बात पहुंचाय दीजौ। आगे कौ काम तौ बु आपते ऊ चोखौ करि लेगौ। अच्छौ, अब जय श्रीकृष्ण करूं हूं।''
वार्तालाप के अंत में सूरदासजी ने बताया कि कबीरदास की राम की बहुरिया आपसे बातें करने को बहुत उत्सुक हैं। अगर उनका फोन आए तो सुन लीजिएगा।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)

पृष्ठ-3

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1   2   3
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |