रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

हमारी जान में जान आई।
"शुक्रिया ! मज़ार साहब!'' हमने कहना आरंभ किया "अपने मज़मून के बारे में तो आपको बाद में तकलीफ दूंगा, अगर इज़ाजत हो तो पहले आपकी ख़िदमत में कुछ अर्ज़ करना चाहता हूं।''
आवाज़ मुलायम हुई और हमें सुनाई पड़ा, "जी हां, बड़े शौक और इत्मीनान से पूछिए।''
"बहुत ही शुक्रगुज़ार हूं, मज़ार साहब ! मुझे पूछना यह है कि आप कहां से बोल रहे हैं ? कैसे बोल रहे हैं ? फोन आपके पास आया है या आप खुद फोन पर तशरीफ ले आए हैं ? ईंट, चूने और पत्थरों को तो बोलते कभी किसी ने सुना नहीं ? आदमी का 'स्पोक्समेन' (प्रवक्ता) तो आदमी ही होता है, पत्थर नहीं होता।'' फोन पर पुनः अट्टहास गूंज उठा, मगर इस बार उसमें पहले जैसी विकटता नहीं थी, उपहास का पुट ही अधिक था। सुनाई पड़ा, "अरे मियां, जब दीवारों के कान हो सकते हैं तो मज़ारों के मुंह नहीं हो सकता ? मालूम पड़ता है कि तुमने अभी दुनिया को ठीक से देखा-परखा नहीं। आज आदमी पत्थर बन गया है और पत्थर इंसान। ज़माने ने आज आदमी की जुबान बंद कर दी है और पत्थर चहकने लगे हैं। फिर मैं ? जनाब, मेरा जिस्म ही चूने-पत्थर का बना है। मेरे अंदर जो इंसानियत की रूह बसी हुई है, उसे आज के इंसान जानकर भी नहीं जान पाएंगे।"
सुनकर हम सन्नाटे में आगए। कुछ कहने ही वाले थे कि उधर से फिर सुनाई दिया, "पत्थर के भी दिल होता है, भाईजान ! वह आदमी के कलेजे की तरह नहीं है, बेवफा और खुदगर्ज़ ! आपने इतना बड़ा मज़मून लिखकर खानखाना की कब्र पर रखा। मैं पूछता हूं कि क्या खानखाना के साथ उनकी ज़िंदगी में या उनके गुज़रने के बाद इंसाफ हुआ ? क्या ऐसे शेरेनर, क्या ऐसे नेक इंसान और इतने ऊंचे शायर का यही हश्र होना चाहिए था ?''
हमने कहा, "दुरुस्त फरमाते हैं, मज़ार साहब !''
"क्या दुरुस्त फरमाते हैं ?'' इतने ज़ोर से कहा गया कि हम तो अपने को जैसे-तैसे संभाल गए, मगर एक्सचेंज पर बैठे हुए सरदारजी की चीख निकल गई। सुनाई पड़ा -
"बे महाबीरा, तू फड़ एस चोंगे नूं, मैं ज़रा चा-चू पी आवां।''
उधर मज़ार साहब फरमा रहे थे, "बेवफाई की भी हद होती है। जिस सल्तनत की ख़ातिर रहीम ने खुद को गारत कर दिया उसी ने उसे गद्दार करार दिया। मज़हब के जिन ऊंचे उसूलों पर वह सब कुछ खोकर भी टिका रहा, उसी के ठेकेदारों ने उससे निगाह चुरा ली। शियाओं ने उसे शिया नहीं जाना। सुन्नियों ने उसे सुन्नी नहीं माना। मुसलमान उसे हिंदू कहते रहे और हिंदू उसे मुसलमान। और अदब (साहित्य) की दुनिया वाले तो उनसे भी बढ़कर एहसान-फरामोश निकले। जिसने अपनी सारी दौलत शायरों और कवियों की छोटी-छोटी सतरों पर फूल की तरह बिखेर दी, आज उसका हिन्दी, संस्कृत और फारसी में कहीं कोई नाम लेने वाला है ?''
हम क्या जवाब देते ? सिर झुकाए सुनते रहे। मज़ार साहब कहे जा रहे थे, "मैं पूछता हूं जनाब, क्या नाम है आपका, जो भी हो, क्या एक छप्पय पर छत्तीस लाख देने वाला कोई माई का लाल दुनिया की किसी भाषा के इतिहास में कहीं पैदा हुआ है ? कोई शायर कहीं से आए और लाख रुपया सिर्फ अपनी आंखों से देखना चाहे

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