तो उसे न सिर्फ दिखाकर, बल्कि ज़बर्दस्ती भेंट कर देने वाला कोई दाता कहीं सुना है ?''
हमारे मुंह से निकला," नहीं।'' "तो फिर उसका आज यह हाल कि इतिहास के जर्क खाए वर्कों के अलावा न अदब की दुनिया में उसकी कोई चर्चा है और न खोज-ख़बर ! न रिसालों में उस पर मज़मून छपते हैं और न यूनिवर्सिटियों में उस पर कोई रिसर्च ही होती है। उसकी अंतिम यादगार, यानी मैं भी धीरे-धीरे दम तोड़ रहा हूं। मेरे टुकडों को उखाड़कर चोरों ने अपने घर बना लिए। कल तक डाकू-लूटेरे मेरे आस-पास डेरे डाले रहते थे। अब ज़रा घास-फूस लग जाने से अलबत्ता कुछ शौकीन-मिज़ाज इश्क फरमाने यहां गाहे-बगाहे ज़रूर आ जाते हैं। खानखाना का दिल तो दुनिया से पहले ही टूट गया था, अब तो उन्हें और भी दुनियादारों से नफरत होगई है। आपका मज़मून पड़ा हुआ है। उसे वापस ले जाइए। खानखाना को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं। उन्हें न तारीफ़ की तमन्ना है और न पब्लिसिटी की तवक्को ! वह इन सब चीजों से ऊपर हैं। उन्होंने कहलवाया है......''
"क्या कहलवाया है ?'' हमने ज़रा उतावली से पूछा।
"कहलवाया है,'' मज़ार साहब बताने लगे," मज़मून के लिखने वाले से कहना कि साहित्य और राजनीति दोनों रकाबों में पैर रखना ठीक नहीं। अगर आदमी समर्थ हो तो दो औरतों से तो शादी करके एक घड़ी सुख से रह भी सकता है, मगर साहित्य और राजनीति से एक साथ शादी करके न कोई कभी सुखी रहा है और न रह सकता है। एक म्यान में दो तलवारें रह सकती हैं, मगर ये दोनों सौतें नहीं रह सकतीं। आजकल के हिन्दी और उर्दू के लेखक जो दोहरा खेल खेल रहे हैं, वह बड़ा ख़तरनाक है। इससे लोक भी बिगड़ता है और परलोक भी। साहित्यकार का राज्याश्रय से क्या ताल्लुक ? राजनीति कभी साहित्य को आश्रय नहीं देती, स्वयं के लिए साहित्य के पट की ओट लेती है और काम निकलने के बाद उसी को जला देती है-
जेहि अंचल दीपक दुर्यो, हन्यौ सो ताही गात।
'रहिमन' असमय के परे, मित्र शत्रु ह्वै जात ॥
मज़ार साहब कहते गए, "खानखाना से इस बारे में मेरी अकसर बातें होती रहती हैं। उनका कहना है कि राजनीति तो बेर के वृक्ष के समान है और साहित्य केले के पत्तों के समान। इन दोनों का साथ भला कभी हुआ है ?
कहु 'रहिम' कैसे निबहि केर-बेर कौ संग।
वो डोलत रस आपने, इनके फाटत अंग॥
एक बार साहित्यकार अगर राजनीति के घेरे में आगया तो उसे जीते-जी मरा ही समझिए। साहित्यकार सदैव से निर्बल रहा है और राजनीति हमेशा से सबल। खानखाना ने इसी पर एक दोहा कहा है,
कैसे निबहैं निबल जन, करि सबलन सौं बैर।
अंत में बेचारे शायर यानी लेखक की हालत मछली जैसी हो जाती है। वह तड़फड़ा-तड़फड़ाकर प्राण छोड़ता है-
खरच बढ्यौ, उद्यम घट्यौ, नृपति कठिन मन कीन।
कहु 'रहिमन' कैसें जिए, थोरे जल की मीन ॥
इसीलिए खानखाना का कहना है कि राजनीति पहले तो साहित्यकार का पूरा रस निचोड़ लेती है और जब दीन होकर वह अपने जीवन के लिए बाद में अरज करता है तो उसकी गरज को नहीं सुनती :
अरज-गरज मानें नहीं, 'रहिमन' ये जन चारि ।
रिनिया, राजा, मंगता, काम-आतुरी नारि ॥
हमने पूछा, "तब क्या करना चाहिए ?''
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