रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

"खानखाना तो अपने अनुभव से इस फैसले पर पहुंचे हैं कि या तो आदमी राजनीति का हो जाए या साहित्य का ही। वह अद्वैतवादी हैं। दुनिया उन्हें नहीं जंचती। उन्होंने फरमाया है :
एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
'रहिमन' मूलहि सींचबो, फूलहिं-फलहिं अघाय॥

और यह मूल साहित्य है, राजनीति नहीं। साहित्य के मूल को ठीक से सींचने पर राजनीति की डाली में भी सुंदर फूल उग सकते हैं, लेकिन राजनीति के फूल को सींचने से तो समूचा पेड़ ही सूख जाता है।''
"लेकिन मज़ार साहब, आजकल खाली साहित्य से किसी का पेट भरता है ? अब रहीम जैसे गुण-ग्राहक और दाता तो रहे नहीं, साहित्यकारों को पेट भरने के लिए इधर-उधर हाथ मारने पड़ते हैं। सामर्थ्य बटोरनी ही पड़ती है। पुरुषार्थ बताना ही पड़ता है।''
टेलीफोन पर हंसी की आवाज़ फिर सुनाई दी। मज़ार साहब कह रहे थे, "पुरुषार्थ ! आदमी का पुरुषार्थ !! मियां, उससे क्या होता है। आपने रहीम का यह दोहा नहीं सुना ?
जो पुरषारथ के लिए, संपति मिलत 'रहीम'।
पेट लागि वैराट घर, तपत रसोई भीम ॥

हमने टोका, "मगर मज़ार साहब, उपदेशों से किसी की भूख नहीं मिटती। साहित्यकार भी दुनिया का आदमी है। उसकी ज़िदगी में भी कुछ चाह होती है और चाह की राह आप जानते हैं, राजनीति की तिजोरी में ही बंद है।''
मज़ार साहब ने उत्तर दिया, "मगर खानखाना आपकी बात से सहमत नहीं हो सकते। उन्होंने तो एक दिन मुझसे कहा था-
चाह गई, चिंता घटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनकों कछू ना चाहिए, वे शाहन के शाह॥''

"शुक्रिया, मज़ार साहब ! रहीमजी ने कोई और भी संदेशा दिया है क्या ?'' हमने पूछा।
"हां, दिया है।'' जवाब मिला- "उन्होंने कहा, उस मज़मून को साया न करें। रहीम और रहिमन एक ही हैं। रहिमन न मेरी बीवी का नाम था और न चहेती का। दोहा, बरवै, सोरठा, पद सब मेरे ही लिखे हुए हैं, गंग वगैरह के नहीं। इस तरह के लेख छपने से ख़ामखां ग़लतफहमी बढ़ेगी। और ....''
"और क्या, मज़ार साहब ?''
"और यह कि आज तक खानखाना ने अपने पास आने वाले किसी लेखक को खाली हाथ नहीं जाने दिया। आपके लिए भी उन्होंने कुछ देने को कहा है।'' "क्या ?'' हमने उत्सुकता से पूछा !
हमें फोन पर सुनाई पड़ा, "कल रात को बारह बजे आप खानखाना के मज़ार पर आइए। दाहिने हाथ वाले दरवाजे की बाईं ओर वाले सहन में आपको एक हांडी मिलेगी। उसे उठा लेना और बिना पीछे की ओर देखे चुपचाप लेकर चले जाना। रास्ते में उसे खोलना नहीं। घर आने पर आपको अपनी उजरत मिल जाएगी।'' इससे पहले कि हम कुछ जवाब दें, टेलीफोन एक्सचेंज पर हांडी का नाम सुनते ही हड़बड़ी मच गई। एक कह रहा था कि हांडी मेरी है और दूसरा कह रहा था कि मैं उसे लेने जाऊंगा। शायद सरदारजी और महाबीरा में कहा-सुनी ही नहीं, हाथापाई भी होने लगी थी और इसी झगड़े में हमारा फोन कट गया।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)

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