लोग कहते हैं कि हिन्दी में विज्ञान का साहित्य नहीं। विज्ञान में अनुसंधान होता है। आप बताइए कि भारत में अणु-अनुसंधान से भी अधिक खोज हिन्दी के नये बनने वाले डॉक्टरों ने अपने डॉक्टरेट के निबंधों में की है या नहीं ? हमने विश्वविद्यालयी साहित्य को भी तीन भागों में विभक्त किया। पहला वह जो परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए लिखा जाता है, उसका छपने से या जनता के सामने जाने से कोई सरोकार नहीं। विश्वविद्यालयों के सैकड़ों शिक्षक-प्रशिक्षक इसी कोटि में आते हैं। दूसरी कोटि की रचनाएं वे हैं जो परीक्षार्थियों के लिए लिखी जाती हैं। इनका उद्देश्य लेखक क े लिए रायल्टी और परीक्षार्थियों के लिए डिग्री प्राप्त करना होता है। ये रचनाएं पाठ्यक्रम स्वीकार करने वाली समिति के सदस्यों के विचारों के आधार पर तैयार की जाती हैं। साहित्य या जनता से इनका कोई लगाव नहीं होता। तीसरी कोटि की रचनाएं वे हैं जो शास्त्रीय कोटि के अंतर्गत आती हैं। प्रायः विभागों के अध्यक्ष अपने शिष्यों और संप्रदाय के लेफ्टिनेंटों पर प्रभाव डालने के लिए इन्हें लिखते हैं। ये आकार-प्रकार में काफी बड़ी होती हैं, क्योंकि इनके लेखकों का यह विश्वास होता है कि जितनी बड़ी पुस्तक उतना बड़ा लेखक ! साथ ही यह भी कि जो अध्यक्ष तादाद में जितनी अधिक पुस्तकें लिख सकता है, वह उतनी ही अधिक सरकारी समितियों का सम्मानित सदस्य भी बन सकता है।''
"परंतु," शुक्लजी बोले, "मेरी दृष्टि से ये रचनाएं भी शुद्ध साहित्य के अंतर्गत नहीं आतीं। समीक्षा का भी एक सृजन पक्ष है, जो इस प्रकार के लेखकों की कृतियों में नहीं पाया जाता। पाठ्यक्रम बदलने के साथ ही इनके बारे में भी लोगों के विचार बदल जाते हैं। समीक्षा तो एक दृष्टि है, विचार है, अभिव्यंजना है। आप तो जानते ही हैं कि मैं इस मामले में क्रोंचे का प्रशंसक हूं। मुझे हिन्दी के अध्यापकों का व्यर्थ गुरुडम और चर्चित चर्वण तथा अमौलिक लेखन-पद्धति ज़रा भी नहीं सुहाती।''
शुक्लजी हमें बोलने का अवसर दिए बिना ही आगे कहने लगे, "आजकल अख़बारों के माध्यम से भी काफी साहित्य प्रकाश में आ रहा है। परंतु......''
परंतु वह 'परंतु' ही कह पाए थे कि छः मिनट समाप्त होगए और फोन कट गया।
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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