कहावत अवश्य सुनी है कि गंजों के अगर नाखून होते तो खुजाते-खुजाते मर जाते, पर ऐसा कभी देखा नहीं गया। हमने इसी जन्म में अपनी आंखों से दो-चार नहीं, सैकड़ों गंजे देखे होंगे और उन सबके नाखून भी थे, यदा-कदा अपनी खोपड़ी भी खुजलाते हैं, मगर आपको जानकर खुशी होगी कि सब-के-सब अभी तक भारत की जनसंख्या में वृद्धि ही कर रहे हैं। इसके मतलब क्या हुए ? या तो कहावत झूठी है या गंजे गंजे नहीं हैं अथवा उनके नाखून नाखून नहीं कहे जा सकते। हमें इन तीनों बातों की तह में वैसी ही सावधानी से उतरना पड़ेगा जैसे अमरीकी लोग रूसी बातों की छानबीन में गहरे गोते लगाया करते हैं। हमें इन तथ्यों का विस्तार से वैसे ही सर्वेक्षण करना पड़ेगा जैसे भारत सरकार ग़लती करने के बाद उस पर जांच कमेटी बिठाकर बड़ी मुस्तैदी से काम किया करती है। यह लेख आज से शुरू होकर भले ही साल-भर बाद समाप्त हो, मगर हमें राष्ट्रपति के राजभाषा आयोग की तरह इसकी पूरी-पूरी तफ्तीश में जाना ही पड़ेगा, परिणाम जो भी हो। हमें तो कर्म करने की छूट है, शेष तो भगवान कृष्ण गीता में कह ही गए हैं- मा फलेषु कदाचनः।
इस शुभ कर्म में प्रवृत्त होने से पूर्व पहले हमें गंजों की व्याख्या करनी पड़ेगी। 'हिन्दी शब्द सागर' में लिखा है कि गंजा वह है, जिसके सिर के बाल उड़ गए हों, मगर यह नहीं लिखा गया कि सिर के बाल कैसे उड़े हों ? सिर के बाल तो कई-कई तरह से उड़ते हैं जी ! कुछ के बाल तो मां-बाप के मरने पर नाई उड़ा देता है, कुछ कर्म ऐसे करते हैं कि लोग-बाग नाई को यह कष्ट नहीं उठाने देते और स्वयं यह शुभ कार्य कर दिया करते हैं। जैसे कुछ के बाल धूप मे सफेद होते हैं, उसी प्रकार कुछ के बाल तेज लू में झुलसकर उड़ भी जाते होंगे। गंज एक तरह का रोग भी होता है। कहते हैं उससे सिर के बाल उड़ जाया करते हैं। पर रोग-दोष से हमें आपको क्या लेना। हमारे अनुसंधान का विषय तो वह गंजा है,जो उत्तर भारत में, विशेषकर पढ़े-लिखे वर्ग में अधिक पाया जाता है, जिसे संस्कृत में खल्वाट कहते हैं और इस 'खल्वाट' के संबंध में बड़ी धूमधाम से यह घोषणा की गई है- 'क्वचित खल्वाट निर्धनः'। खल्वाट का संबंध खल से कितना है, यह तो भाषाशास्त्री ही बता सकता है। मगर भारतीय रजतपट पर हमने ऐसे कई खेल देख हैं जिनमें खलनायक की खोपड़ी शीशे की तरह चमकदार दिखाई देती है। खल्वाट का संबंध धन से कितना है, इसकी सही-सही जानकारी तो आयकर विभाग वाले ही दे सकते हैं या उनकी पूंजी का तो बैंकों के खातों, डाकखाने की किताबों और राष्ट्रीय बचत-योजना के दफ्तरों से मालूम किया जा सकता है। लेकिन इतना हम अवश्य जानते हैं कि गंजों का धन से चाहे जितना हो, निर्धनता से कोई संबंध नहीं। अपना न हो, पराया हो, कमाया न हो, पाया हो, उठाया हो, चुराया हो, गर्ज़ यह है कि धन खल्वाटों के पास रहता अवश्य आया है। वे नोटों को खर्च कर सकें या न कर सकें, गिनते अवश्य रहते हैं। आपने देखा होगा कि सेठों के अधिकतर मुनीम गंजे होते हैं। बैंकों के खजांची छांटकर गंजे रखे जाते हैं। अगर ग़लती से बाल वाले रख भी लिए जाएं तो या तो वे ग़बन के अपराध में जेल चले जाते हैं अथवा गिनते-गिनते फिर वे ही हो जाते हैं जिन पर हम यह लेख लिख रहे हैं। कुछ लोगों का तो कहना है कि सिर के बाल तो सोचते-सोचते उड़ जाते हैं, यानी बालों के उड़ने का संबंध सोच-विचार से है। तात्पर्य यह है कि मूर्ख नहीं, विचारवान पुरुष ही गंजा होता है।
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