खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

जब समझदारी ज़रूरत से ज्य़ादा बढ़ जाती है तो वह खोपड़ी फोड़कर निकलने लगती है और उसकी राह में आए बाल तबाह हो जाते हैं। बात कुछ जमती तो है कि बालहीनता बुद्धिमानी की निशानी है। भगवान बुद्ध ने शायद इसीलिए अपने शिष्यों को अपने साथ सदैव एक उस्तरा रखने का आदेश दिया था। इसके विपरीत शास्त्रों में स्त्री को पुरुष के मुकाबले शायद इसीलिए कम भक्त ठहराया गया है कि उसके सिर पर बड़े-बड़े बाल होते हैं। नारियां ही क्यों, सिर पर बड़े-बड़े बाल रखने वाले आदमियों को कम लोग ही बुद्धिमान कहते हैं। बच्चों का मुंडन संस्कार, यज्ञोपवीत से पहले खोपड़ी की घुटाई, श्राद्ध-तर्पण के समय भद्र-क्रिया और योगियों का सदैव खल्वाट रहना आदि प्रथाएं या तो गंजे ऋषियों या मां-बापों ने चलाई हैं। अथवा यह मानना पड़ेगा कि बालों का और अक्ल का बैर है। ऐसा न होता तो लोग रोजाना दाढ़ी सफाचट करने का सिलसिला आरंभ करते ? गंजों के सिर पर बाल भले ही न हों, लेकिन धड़ के नीचे कुर्सी अवश्य होती है। भारत के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत की सबसे बड़ी कुर्सी को दसियों साल दबाए रखा। एक बार हमने पता लगवाया था तो मालुम हुआ सिर्फ जवाहरलाल ही नहीं, केन्द्र और प्रदेशों के बीसियों मंत्री और राज्यपाल ऐसे हैं जिनकी खोपड़ी के बाल गंगा-स्नान करने गए हुए हैं। भारत सरकार के तीन-चौथाई आई.सी.एस. गंजे हैं। सेक्रेटरियों और डायरेक्टरों में तो कोई बिरला ही ऐसा होगा जिसकी खोपड़ी के बाल सही सलामत हों। 'सफल संपादक' तो होते ही गंजे हैं। बनारसीदास चतुर्वेदी जीवन में इसीलिए असफल रहे कि उनकी खोपड़ी पर बालों की खेती बिना आब-पानी के लहराती रही है। मगर आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी हिन्दी जगत में इसीलिए सफल होगए कि विधाता ने न केवल उनके दुश्मनों को, बल्कि बालों को भी उनके सिर पर नहीं जमने दिया। श्री अंबिकाप्रसाद वाजपेयी के संपादकाचार्य बनने का रहस्य कलम नहीं, खल्वाट खोपड़ी ही थी। हिन्दी पत्रकारिता में विद्यालंकारों ने बड़ी घुसपैठ की मगर गंजे न होने के कारण उनमें से एक भी चोटी का पत्रकार नहीं बन सका। इसके मुकाबले सिर्फ अपनी इसी विशेषता के कारण ही जयचन्द्र विद्यालंकार हिन्दी जगत में नाम कर गए। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई ऐसी महत्वपूर्ण कुर्सी नहीं, जिस पर गंजा न जमा बैठा हो, चाहे ख्रुश्चेव हों, चाहे आइज़नहावर, चाहे चर्चिल हों चाहे डी गॉल, खुदा के फज़ल से सबकी खोपड़ी सफाचट है और सभी के नाखून हैं, पर भगवान की कृपा से सभी बरकरार हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कसूर खोपड़ी का नहीं, नाखून का है। खोपड़ी तो खुजने के लिए प्रस्तुत है मगर नाखून नहीं मिलते- "गुन न हिरानौ, गुन गाहक हिरानौ है''। आजकल जब अच्छे आदमी ढूंढे नहीं मिलते तो नाखूनों की क्या चलाई। भारत के हथियारों पर ही जब धार नहीं रही तो नाखून बिचारे किस लेख में हैं। नाखून तो तब चलेंगे, जब अंगुलियां चलेंगी, अंगुलियां तब चलेंगी जब कलाई मज़बूत होगी। कलाई को तो कलम उठाने में मोच आती है, अंगुलियों को नाखून धारण करने में बोझ लगता है। जब नाखून रहेंगे नहीं, तो वे चलेंगे क्या खाक ? पहले ज़माने में औरतें हर रोज़ अपने नाखून कुतरा करती थीं, अब मर्दों ने यह बात सीख ली है। नाखून तो बेचारे तरस कर रह जाते हैं, पर उन्हें जौहर दिखाने का अवसर नहीं मिलता। एक बार हमने उनसे इंटरव्यू लिया था तो उन्होंने कहा था-आप हमें बुज़दिल न समझिए, खल्वाट खोपड़ी पर रेखाचित्र बनाने में हमें बड़ा मज़ा


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