खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

आता है, पर हाय, वैसा अवसर ही नहीं मिलता कि हम रेखाचित्रों से बढ़कर वहां भाखड़ा की नहरें खोद के और योगीजन जिस मुक्ति के लिए तरसते हैं, वह ब्रह्‌मरंध्र खोलकर गंजों का जीवन सार्थक कर सकें। तनिक कल्पना कीजिए कि खुदा ने अगर गंजों को नाखून दिए होते तो क्या होता ? होता यह कि गंजे तब खुली खोपड़ी घूमना छोड़ देते। और उनकी देखा-देखी हिंदुस्तान में नंगे सिर फिरने का रिवाज़ न चलता। ये भांति-भांति की पगड़ियां, साफे, टोपियां और टोप हिंदुस्तान से देखते-देखते यों विदा हो जाते। बिना बालों वाले सोचते हैं कि हमारे अपने नहीं, पराए नाखून भी इस सफाचट मैदान में खेती करने के लिए कहीं अपने हल-बैल न जोत दें। कभी आपने किसी गंजे की खोपड़ी को बहुत निकट से देखा है ? उस पर कभी हाथ फेरने का सुअवसर प्राप्त किया है ? नाखून की बात छोड़िए, अगर कभी उस पर आपको उलटी या सीधी अंगुली चलाने का मौका मिला है तो पता चला होगा कि वह स्थान कितना कोमल, कितना सरस, कितना सुचिक्कण है कि देव कवि के इस छंद को उस पर आसानी से चस्पां किया जा सकता है-

"माखन सो मन, दूध सो जोबन,
है दधि सो अधिक उर-ईठी।
जा छवि आगे छपा कर छाछ,
लगे है सुधा-वसुधा सब सीठी।
ऐसी रसीली-सुरीली सी टांट,
सु क्यों न लगे मनमोहन मीठी।"

निश्चय ही इस टांट से बड़े मीठे बोल निकलते हैं। जरा चांटी चलाकर कभी देखिए तो सही इससे धा भी साफ निकलता है और धिन भी। किट भी साफ निकलता है और गिध भी।
एक बार एक मित्र ने हमें ध्रुपद के प्रयोग के लिए सेवाभाव से यूं ही अपनी टांट सुलभ कर दी थी। तो हमने उस दिन बिना सीखे ही "धा-धा-धिन-ता किट धा-धिन्ना, किट-किट-गिद-गिन धा-धा-धिन-ता'' के बोलों पर वह समां बांधा था कि मथुरा के मक्खन पखावजी स्वर्ग से उतरकर वाह-वाह करने लगे थे।
गंजों को अगर नाखून मिल गए होते तो उन्हें अपनी खोपड़ी पर ही उनके प्रयोग करने की नहीं, वैसे भी नाखून मारने की आदत पड़ जाती और तब केवल कामशास्त्र में ही नहीं, व्यवहारशास्त्र में भी नाखूनों पर बड़े-बड़े रोचक, सरस और रोमांचक छंद-प्रबंध लिखे जाते। फिर केवल कामिनियों के उन्नत उरोज ही नख-चिह्‌न-चिन्हित होते, गंजे लोग अपने मित्रों के कपड़ों और शत्रुओं के मुखड़ों पर भी उनकी स्थायी छाप छोड़ते और साहित्यशास्त्र में नई प्रकार की खंडिताओं और कलहान्तरिताओं का समावेश हो जाता। केवल नायिका ही नहीं, खंडित और कलहान्तरित नायक भी जन्म लेने लगते।
अगर गंजों को सचमुच नाखून मिल गए होते तो यह कहावत कैसे बनती ? सारे अपात्र तब पात्रता न पा गए होते। हमने कलम से ही अपने दुश्मनों का सिर न काट लिया होता। और अगर सचमुच कहीं आप खल्वाट होते तो अपनी छोड़कर आपकी खोपड़ी पर हमने अपने नाखूनों की धार तेज न कर ली होती।वह तो अच्छा ही हुआ कि खुदा ने गंजों को नाखून नहीं दिए।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)


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