मरें तो मेरे दुश्मन, यहां तो सिर में दर्द तक नहीं हुआ ! सिर्फ आपसे कहता हूं कि 'बाहर' की तो क्या चली घर में यानी
'उनसे' मतलब अपने संतान की जन्मदात्री से शायद भूलकर भी कभी सच नहीं बोलता। लेकिन इस पर भी दावा यह है कि आज तक किसी ने मुझे सरेआम झूठा बताने का हौंसला नहीं किया।
आप झूठ बोलिए और फिर बोलिए, लेकिन भाई मेरे तनिक सफाई के साथ ! इसी को दुनियादारी कहते हैं, इसी में सफलता छिपी है। झूठ बोलना भी एक कला है-एक महान आर्ट ! इसकी महानता के आगे चित्रकारी के रंग फीके हैं, संगीत का स्वर बेसुरा है और कविता के छंद निरर्थक हैं।
लोग कहते हैं कि जिसने सत्य को पा लिया उसने परमेश्वर को पा लिया। एकदम ग़लत ! बात सही यह है कि जिसने झूठ को पा लिया उसे कुछ और पाना शेष नहीं रहा ! झूठ परम तत्त्व है ! अजरामर है। सनातन है। निर्विकल्प है। संपूर्ण जगत में व्याप्त है। यद्यपि यह भेदाभेद से परे है, फिर भी अभ्यास या साधना के लिए मैंने कुछ इसके भेद किए हैं, जैसे-(1) शुद्ध झूठ (2) अशुद्ध झूठ (3) सफेद झूठ (4) बे-सिर-पैर की (5) मनगढंत (6) गप्प और (7) चार-सौ-बीसी। देशकाल, अवस्था और समय-संयोग के अनुसार इनके फिर सैकड़ों प्रकार होते हैं। स्थान-संकोच से उनका वर्णन यहां नहीं किया जा सकता। फिर इस विषय पर हिंदुस्तान के तैंतीस करोड़ देवी-देवता घर-घर में नित्य नये अनुसंधान कर रहे हैं। इसलिए अभी से इस शास्त्र को लिपिबद्ध करना ठीक नहीं। ऐसा करना इसकी बढ़त को रोक देना है।
मेरा मत है कि आजकल बिना झूठ के शरीर रूपी गाड़ी जीवन-दलदल को पार नहीं कर सकती। उदाहरण चाहिए ? तो मान लीजिए आप किसी दफ्तर में बाबू हैं। बाबू भी ऐसे कि नेक-नीयत के सबूत में फाइलों पर झुकते-झुकते आपकी गर्दन ख़म खा गई। लेकिन आपको चाहिए चार दिन की छुट्टी। निहायत ज़रूरी काम आ पड़ा है। काम भी ऐसा जिसे टाला न जा सके। आपकी पत्नी के भाई के लड़के को जु़काम हुआ है। वह बेचारा हरदम छींकता रहता है। आपकी 'उनके' भाई-भावज सब परेशान हैं। उनके आने वाले खत हमेशा छींकों से भरे रहते हैं। पत्नी का कहना है कि इस हालत में अगर हम बच्चे को देखने नहीं गए तो रिश्तेदारी में नाक कट जाएगी।
आदमी को अपनी नाक का खयाल नहीं तो वह आदमी नहीं। लेकिन आदमियत के इस सच्चे मसले को आप अपनी अर्ज़ी में लिखकर बड़े बाबू को भेजकर तो देखिए ? सत्य बोलने को आजन्म लाचार हो सकता हूं अगर इस जन्म में तो क्या अगले सात जन्मों तक भी छुट्टी मंजू़र होकर आ जाए ! ऐसी जगह आपको फ़न खोलना ही पड़ेगा। जैसा कि अक्सर मैं और मेरे साथी बाबू करते हैं, पड़ोसी डॉक्टर की जेब में दस-दस रुपये के दो नोट डालते हुए कहा जाए-"डियर डाक्टर एक सर्टिफिकेट तो बना दो।'' डॉक्टर भी इस फन में कम होशियार न निकलेगा। वह लिखेगा," ऐसा मालूम होता है कि बाबू को ज़ोर से सर्दी का अटैक हुआ है। दोनों फेफड़े भरे हैं। इन्हें एक सप्ताह इलाज़ और आराम की सख्त ज़रूरत है।''
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