लीजिए आपने मैदान मार लिया। बस के लिए दो रुपये का नोट किसी लड़के को देकर अर्ज़ी दफ्तर रवाना कीजिए और आप ससुराल का टिकट कटाइए। अगर ससुराल का पानी लग जाए और 'श्वसुर गृह निवासम् स्वर्गतुल्यम् नृणानाम्' उक्ति सही साबित हो तो दस-दस रुपये के दो नोट डॉक्टर को और थमाइए, फिर लगाइए एक सप्ताह और
गोता। कोई पनडुब्बी आपको नहीं खोज सकती और कोई अक्ल का कच्चा यानी सच्चा इस महान सच को झूठ साबित नहीं कर सकता।
मेरे अपने साथ घटी एक घटना लीजिए। पिछले जून के महीने में जब मैं बच्चों के साथ घर से वापस दिल्ली लौट रहा था तो मुझसे भी ज्य़ादा किसी होशियार ने मेरी जेब से मनीबैग साफ कर दिया। टिकट, रुपया सभी कुछ उसी में थे। नई दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो होश फाख्ता ! कुली सामान लेकर गेट की ओर चल रहा था, बीवी-बच्चे दिल्ली लौट आने से खुश थे, पर मेरी अंगुलियां जेबों को कुरेद रही थीं और चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं कि हाय राम, अब क्या होगा ? दो-तीन मिनट इस ग़म में डूबा रहा कि टिकट का चार्ज तो दूर, इस कुली को क्या दिया जाएगा ? लेकिन ज़िंदगी भर झूठ को गले लगाया था। आख़िर उसने उबार ही तो लिया। मैं आगे-आगे हो लिया। गेट पर आकर टिकट कलक्टर को सुनाते हुए श्रीमती से बा-अदब कहा, "आइए, इधर से आइए। क्यों भाई साहब साथ में नहीं आए ? मुझे तार तो तुम्हारा मिल गया था, रास्ते में कोई तकलीफ़ तो नहीं हुई।''
श्रीमतीजी यह रंग-ढंग देखकर पहले तो अचकचाईं, लेकिन वे भी तो आख़िर मुझ प्रमाणित असत्य-भाषी की अधर्म-पत्नी थीं। फौरन संभलकर मुझसे भी सवाई होकर बोलीं, "उनके कोर्ट में जरूरी मुकदमा था। कहने लगे तार तो दे दिया है। स्टेशन पर जीजाजी आ ही जाएंगे, चली जाओ। पर गाड़ी में आजकल बड़ी भीड़ रहती है। फर्स्ट क्लास में भी आदमी का भुरता बन जाता है।'' टिकट कलक्टर बेचारा रौब में आगया। उसने समझा किसी जज की बहन है और मुझ कांग्रेसी एम.पी. को ब्याही है। टिकट मांगना तो दूर , वह अदब से एक तरफ खड़ा होगया। जान बची और लाखों पाए। मेरा ख्य़ाल है कि अगर मैं सच्चाई से काम लेता तो कहीं का न रहता। यह झूठ बोलने का ही प्रताप था कि जान बच गई। इसीलिए तो कहता हूं कि "झूठ बराबर तप नहीं'' और दावा ठोकता हूं उस गीत बनाने वाले पर, जिसने यह झूठ लिख मारा कि, "झूठ बोले कव्वा काटे, काले कव्वे से डरियो।''
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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