व्यंग्य पर व्यंग्य

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

हुआ। 'लिटरेचर' से लोग धराशायी होकर स्ट्रेचरनशीन ही हुए हैं। कभी समाज के लिए पुरयक़ीन नहीं हुए हैं। साहित्य हमेशा मठों और सिंहासनों का चिलमबरदार ही रहा है। भूखी-नंगी जनता के लिए, सिसकती मानवता के लिए वह सर्वदा निराकार ही रहा है। उसे कंधा नहीं, ठोकर चाहिए। यह कोई ईश्वर या मनुष्य का साम्राज्यवाद नहीं है कि उसे 'जोकर' चाहिए। शाहेईरान गए, रहमान गए, अफगान गए, सुलतान गए। एशिया की ऊसर भूमि में 'कैक्टस' खिल रहे हैं नये-नये। तो व्यंग्य की नोंक तेज़ करो। यूरोप से भारत के लदान के लिए चालू फिर से स्वेज करो। ब्रिटेन से लोकतंत्र, फ्रांस से नंगी मूर्तियां, अफ्रीका से गुलामी, अरबों से अमीरी, हिन्द महासागर से घड़ियाल, घोंघे और केंचुए भारत आने के लिए छटपटा रहे हैं। वे बेवकूफ हैं जो निर्यात के मुकाबले में आयात घटा रहे हैं। चीन ने दरवाजे खोल दिए हैं, तुम कम-से-कम खिड़की तो खोलो। बात-बात में गांधी, गंगा और गीता की जय मत बोलो। देखो, वह देखो, उधर से नहीं, इधर से नई रोशनी आ रही है। तुम्हारी पुराण-पंथिता यानी ज़हालत पर सीना तान खिलखिला रही है।
खिलखिलाहट ! मुस्कान ! इनसे भाषा और साहित्य के ये मुहावरे अब पुराने पड़ गए हैं। लिपी-पुती और मुस्कराती सभ्यता पर व्यंग्य के तेवर चढ़ गए हैं। किंतु व्यंग्य के साथ विनोद। जैसे सांप ने ले लिया हो नेवले को गोद। शिमला समझौते का नवीनतम नमूना, एक कत्था तो दूसरा चूना। नया रंग आएगा। हर चौक, गलियारा और देहरी-दालानों का कोना-कोना, नई-नई पीकों से भर जाएगा। पान भारत की सभ्यता का प्रतीक है। मानो किसी तिरस्कृत, वंचिता और उपेक्षिता को चूसकर उगली हुई का नाम पीक है। रूपक सटीक न हो, किंतु आज के व्यंग्य-विनोद की यही लीक है। कुछ भी कहो, कुछ भी लिखो, सब ठीक है। रेडियो बुलाता नहीं। कवि-सम्मेलनों से निमंत्रण आता नहीं। नौकरी रास आई नहीं, जमा-पूंजी के नाम एक पाई नहीं। बेटा अर्राता है। पत्नी का स्वर भर्राता है। तब कवि कैसे जिए ? व्यंग्य लिखे और शराब पिए।
कविताएं छपती नहीं। कहानियां खपती नहीं। उपन्यास का प्लॉट नहीं। कोई परिचर्चा एलॉट नहीं। तब या तो लिखो कव्वाली या बैठे-ठाले बको गाली। गाली भी व्यंग्य का एक प्रकार है। नये साहित्य में उसी की भरमार है। पेशे से टीचर, लिखने लगे फीचर। जब चढ़ा शनीचर। होगए फटीचर। पूछने लगे अब कैसा लिखता हूं। अब लाला की उधार का हिसाब नहीं, व्यंग्य लिखता हूं।
ओ मेरे बालम ! पत्र-पत्रिकाओं में खुल गए हैं व्यंग्य-विनोद के कालम। कलम-कुल्हाड़ा उठाओ। श्रोताओं की खोपड़ी पर आज़माओ। फोटो के साथ लेख भी निकल जाएगा। गंजों की ज़मात का कोई पुरस्कार तुम्हें भी मिल जाएगा।
नेता पर लिखो। अभिनेता पर लिखो। नेशनल से लेकर इंटरनेशनल पुरस्कार-विजेता पर लिखो। चूरन-चटनी से लेकर पुस्तक-विक्रेता पर लिखो। मंत्री पर लिखो। संतरी पर लिखो। जन्मपत्री पर लिखो। जंत्री पर लिखो। रेल पर लिखो। ढकेल पर लिखो। सैकिंड हैंड सेल पर लिखो और कुछ न लिख सको तो ऊंट की नकेल पर लिखो। उनकी 'नो' पर लिखो, इनकी 'यस' पर लिखो। लड़ती रेल पर लिखो, भिड़ती बस पर लिखो। लिखो अमरूद पर, केले पर। लिखो भीड़ पर, अकेले पर। आदमी को लिखो कद्दू। बुद्धिजीवी को बुद्धू। विचारक को पोंगा और

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