प्रचारक को पद्दू। कहो, आदमी पद्दू से ही पद्मसिंह बनता है और ऐसे ही नर-रत्न पर पद्मश्री का ख़िताब खिलता है। आदमी को लिखो भेड़ और भेड़ को लिखो समर्थक। समर्थक को लिखो चमचा और बाकी को लिखो निरर्थक। कहो, समाज में बड़ी विषमता है। केंचुआई सभ्यता का जीव कीचड़ पर ही जमता है। कुछ रोमांस, कुछ गीत, कुछ डांस, कुछ आंसू, कुछ दर्द। लिखो मेरे कवि, कलाकार यानी नामर्द होकर बेलौस। यथार्थ को भोगो और कहो यह है 'पैथोस'।
साहित्य बाजीगर का पिटारा है। वही बैठे-ठाले लोगों का एकमात्र सहारा है। इस पर पहले हंसो, फिर फब्तियां कसो। व्यंग्य बन जाएगा। नाम सुर्खियों में तन जाएगा। कहो, राजनीति वेश्या है और हम हैं तबलची। हमारी ही संगत से उसके घुंघरू छनकते हैं। इसका आशय समझो कि हम हैं मौलिक ओर वे हैं नकलची। कहो, अर्थ की कमी दूर करने का नाम मदिरालय, गोमांसालय है। विद्यालय का नया नाम रोमांसालय है। सयानी लड़कियां यहां इसलिए आती हैं कि वे अधिक-से-अधिक माता-पिताओं की नज़रों से दूर रहें। लड़के इसलिए आते हैं कि 'एलएसडी' के नशे में चूर रहें। अध्यापक पुस्तकें नहीं पढ़ाते, उन्हें यथार्थ जीवन जीना सिखाते हैं। शकुंतला से लेकर उर्वशी तक का प्रेक्टीकल कराते हैं। सिनेमा कुंज-गृह और रेस्तरां है संकेत-स्थल। हिन्दी भी कोई जुबान है, अंग्रेजी भाषा और साहित्य ही है निर्मल गंगाजल।
लिखो कि ज़माना बदल रहा है। देश नारों और नक्कारों से चल रहा है। करोड़ों लोग भूखे सोते हैं, मगर अन्न का उत्पादन बढ़ रहा है। आर्थिक समृद्धि हो रही है, इसीलिए सोने का भाव चढ़ रहा है। वायदों में क्या रखा है, कायदों के नारे बुलंद करो। अख़बारों को ही नहीं, गुंडों को भी स्वच्छंद करो। नाश गरीबी का तो होगया। अब गरीबों की बारी है। घोड़े की घास से पुरानी यारी है। भारत के आंकड़ेबाज इस बात पर आमादा हैं। देश में शेर अधिक है या गीदड़ ज्य़ादा है। लेकिन बात को सीधी या सपाट कहना व्यंग्य नहीं। इसमें 'हयूमर या 'आइरनी' का रंग नहीं। तीर बाघिन पर नहीं, भैंस पर तानो। दुश्मन मत्सर को नहीं, मच्छर को पहचानो। नारी को नागिन नहीं, छिपकली जानो। फाउंटेनपेन की ट्यूब नहीं 'परखनली' मानो। नई कृति से नये शिशु को जन्म दो मेरे राजा ! तभी बज सकेगा तुम्हारे व्यंग्य-विनोद का बाजा।
('व्यास के हास-परिहास' से, सन् 1998)
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