ठंड : आजादी : समाजवाद

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

हम भंगेड़ी-गंजेड़ी और अशिव-वेश मानकर ही पूजने लगें और अपने आस-पास सींग मारने वाले सांडों तथा विष-दंश करने वाले सांपों को ही इकट्ठा कर लें, तो क्या ठीक रहेगा ? प्रोपेगंडा का डमरू बजाने और भीख से अपना खप्पर भरने से आज़ादी की पार्वती प्रसन्न नहीं हो सकतीं। स्वर्ग से उतरी हुई आज़ादी की गंगा को अगर हमारे रुद्र नेता अपनी ही जटाओं में रोके रहेंगे, तो अमृत फलदायिनी, पतित-पावनी गंगा देश की धरती को कैसे पवित्र करेगी ? अगर शिव के गण, मतलब राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता और नेताओं के समर्थक अपने विकट वेश और अधीर कर्मों से प्रजापति के यज्ञ का विध्वंस ही करते रहे तो सुख-शांति कैसे स्थापित होगी ?
धन्य है।
जी हां, हम निःसंदेह आज़ादी पाकर धन्य हुए, लेकिन आज तक ऐसी स्थिति नहीं आ पाई कि इसके लिए जनता नेताओं का धन्यवाद करती और नेता कठिन परिश्रम, सहनशीलता और अटल राष्ट्रभक्ति के लिए जनता को धन्यवाद देते !
जी हां।
और यही बात समाजवाद के कथित आगमन के संबंध में भी है। हमारे यहां पूंजीवाद से पहले ही समाजवाद आ रहा है। श्रमिकों में कर्त्तव्य-बोध की जागृति तो हुई नहीं, उन्हें समाजवाद का बोध कराया जा रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि यह हड़ताल ही समाजवाद है और कुछ लोगों का कहना है कि यह इंपाला समाजवाद है। एयरकंडीशंड बंगलों में बादशाहों की तरह रहने वाले आज समाजवाद के संवाहक हैं। बताइए, जिन्होंने गरीबी देखी नहीं, वे उसके दर्द को समझेंगे ? जिनकी भैंसों और कुत्तों के इलाज राजकीय स्तर पर होते हों, वे अमीरी मिटाएंगे ? भारत की कोटि-कोटि संवेदनशील जनता को जो अनपढ़, अशिक्षित और अस्वस्थ मानकर उससे दूर रहते हों, वे वर्ग-भेद को, असमानता को मिटाने में सहायक हो सकते हैं ?
छोड़ो जी, कहां की बातें ले बैठे ?
हां जी, हमें भी इससे क्या ? हमने भी ठंड से बचने के लिए स्वेटर निकालने को कह दिया है। आज़ादी का ताम्रपत्र पाने के लिए दिन-रात दौड़-धूप कर रहे हैं और पिछले ढाई साल में समाजवाद पर कम-से-कम ढाई सौ लेक्चर झाड़ चुके हैं।
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('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)

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