खुशामद भी एक कला है

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

अमरकथाएं, हजार मुख से खुशामद की ही महान शक्ति का जयघोष कर रही हैं। सतयुग, त्रेता और द्वापर का तो पता नहीं, पर इस कलिकाल में और खास तौर से इस बीसवीं शताब्दी में तो आप जानते हैं कि आज तक किसी ने ईश्वर को देखा नहीं। फिर भी हम उसे सर्वत्र व्याप्त कहते हैं। सब जानते हैं कि रोटी आठ घंटे कड़ी मेहनत और गृहलक्ष्मी की कृपा से प्राप्त होती है, कपड़ा मिलों में बनता है और कंट्रोल के ज़माने में परमिटों से प्राप्त होता है, मकान पगड़ी देने पर खुला करते हैं और नौकरी खुशामद से तथा रोज़गार बेईमानी से फूलते-फलते हैं ? फिर भी हम सब यही कहते हैं कि यह सब उसी का दिया हुआ है। सब उसी की कृपा है।
मरने के बाद सिवाय नचिकेता के आज तक कोई उस दुनिया से नहीं लौटा। आज के वैज्ञानिक चाहे मनुष्य को दस लाख वर्ष पुराना ही मानें, हमारे नचिकेता को हुए करोड़ों वर्ष बीत गए होंगे। इस बीच इस दुनिया में क्या उलट-फेर हुए, यह पता नहीं लग पाया। पता नहीं यमराज की हिटलरशाही अब भी वैसी ही चल रही है या मित्र राष्ट्रों ने उसका भी ख़ात्मा कर दिया है ? क्या पता अब प्रजातंत्र की स्थापना होगई हो ? यह भी संभव है कि स्वर्ग में इन्द्र के अपार वैभव, असमानता को देखकर देवताओं में भी समाजवाद के बीज फूट पड़े हों ? या ईश्वर की अखंड सत्ता भी अब भारतीय नरेशों की भांति वैधानिक ही रह गई हो ? लेकिन हम यह सब कुछ नहीं सोचते और खुशामद के शुद्ध सनातन धर्म को आंख मूंदकर, भक्तिपूर्वक निबाहे जाते हैं।
कहने का मतलब यह है कि खुशामद अनादि है, अनंत है। आत्मा चाहे जर और मर हो, लाख क्रांतियां हों, हजार निज़ाम बदलें, खुशामद अजर और अमर है। सनातन और निर्विकल्प है। देश और काल उसमें बाधा नहीं डालते। जैसे जीवन के साथ मरण जुड़ा हुआ है, उसी प्रकार मनुष्य के साथ खुशामद जुड़ी हुई है। दूध में से पानी को अलग किया जा सकता हो, बालू से छानकर चांदी निकाली जा सकती हो, लेकिन मनुष्य से खुशामद अलग नहीं की जा सकती। वह ईश्वर की नहीं, प्रकृति की करेगा। बादशाहों को छोड़ देगा, मिनिस्टरों की करेगा। उनसे काम नहीं निकलेगा, अफसरों की करेगा। ज़रूरत न होगी तो पूंजीवाद की दुहाई देगा और ज़रूरत होगी तो स्टालिन को सलाम पहुंचवा देगा।
तो फिर खुशामद थी, है और रहेगी, तो क्यों न उसे खुलकर गले लगाया जाए ? फिर क्यों हिचका जाए और तक़लीफें सही जाएं ?
ऐ दुनिया के संत्रस्त प्राणियों ! मैं तो कहता हूं कि विद्या चूक जाए, बल न रहे, धन बेकार हो जाए, रूप का जादू भी न चले और चाहे बुद्धि भी साथ न दे, लेकिन याद रखो, मौके पर आज तक खुशामद ने कभी दग़ा नहीं दी ! जहां सब फेल होते हैं, वहां ब्रह्‌मास्त्र (अब तो 'एटम बम' कहूं तो ठीक होगा) की तरह अकेली खुशामद ही सफल होती है।
अगर आप खुशामद करना चाहते हैं तो कोई परवाह नहीं कि आपके पास डिग्रियां है या नहीं, आप योग्य हैं या अयोग्य, नौकरी आपको ही मिलेगी। आप शक्ल से लाख शेखचिल्ली हों और आपकी जेबों में चाहे सूराख हो रहे हों, लेकिन खुशामद के शस्त्र से प्रेम के पंथ में भी आप बड़े-से-बड़े स्वरूपवान और धनवान को पछाड़ सकते हैं।
दूर क्यों जाते हैं, खुद मेरी खुशामदी सफलताओं का ब्योरा सुनिए न ? कभी हम साहब आठ रुपये महीने के

पृष्ठ-2

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1   2   3   4   5
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |