खुशामद भी एक कला है

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

कंपोजीटर थे। पन्द्रह साल बाद इस तेजी के जमाने में बहुत होता तो पचास रुपये के हो गए होते। हाथ में 'स्टिक' पकड़ते-पकड़ते ठेकें पड़ गईं होतीं। स्टूल पर बैठते-बैठते कमर कमान होगई होती। 'करेक्शन' करते-करते कटाक्ष कोटरलीन होगए होते। बहुत मुमक़िन था कि शीशे की गर्मी श्वास द्वारा फेफड़ों तक पहुंच गई होती और अब तक हमें हमारे बिरादरी वालों ने 'सत्यधाम' भी पहुंचा दिया होता। लेकिन वह तो यह कहिए कि तक़दीर हमारी कुछ अच्छी थी, जो शीघ्र ही हमने खुशामद के महत्व और माहात्म्य को हृदयंगम कर लिया। उस्तादों की चिलम भर-भरकर हजारों नई-पुरानी कविताएं याद कर डालीं। पचासों जगह उन्हें अपनी बताकर सुना डाला। तिकड़म से नकल कर-करके विशारद और साहित्य-रत्न पास कर डाले। कवियों की खुशामद करके कुछ तुकें जोड़ना सीख लिया। महान कवियों और लेखकों की नयी-पुरानी कृतियों पर प्रशंसात्मक लेख लिखे। खुशामद कर-करके इन्हें पत्रों में छपवाया। इस तरह क्रम-क्रम से साधना करने पर आज यह दिन भी आया कि लोग भूल गए कि हम पहले क्या थे, अब तो हम हैं महापंडित स्वनामधन्य श्री-कवि, लेखक और पत्रकार।

तो भाई मेरे ! इसीलिए कहता हूं कि खुशामद से भागो मत। इस दुनिया में सब कुछ असत्य है। सत्य दो वस्तुएं हैं, वह यह कि अगर नालायक हो तो खुशामद करो और अगर लायक हो तो खुशामद कराओ। संसार और सफलता का रहस्य इसी में छिपा है।

इतनी भूमिका और खुशामद के इस महामहिमामय माहात्म्य के बाद आप शायद इस कला के तौर-तरीके अवश्य जानना पसंद करें। यों तो यह विषय योगियों के लिए भी दुर्लभ और तपस्वियों के लिए भी परम गहन है, क्योंकि अपनी पत्नी के पुण्य प्रताप से मैंने इसमें यत्किंचित सिद्धि लाभ की है। इसलिए, अपने चौथाई शताब्दी के कुछ अनुभूत प्रयोग आपकी सुविधा के लिए यहां दे रहा हूं। आशा है मेरे इस परमार्थ से पाठकों का स्वार्थ अवश्य ही सिद्ध हो सकेगा। तो सुनिए, खुशामद की कला में सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण बात यह है कि आप खुशामद तो करें, लेकिन खुशामदी न समझे जाएं। यानी जिसकी खुशामद आप करना चाहते हैं, उसे यह न मालूम हो कि उसकी खुशामद की जा रही है।

आपमें से शायद कुछ मेरी इस बात से सहमत न हों और कहें कि जब परमात्मा सीधी प्रशंसा यानी खुशामद से खुश होता है तो जीवात्मा क्यों नहीं होगा ? दुनिया में ऐसा कौन है जिसे अपनी खुशामद खुद अच्छी नहीं लगती। लेकिन मैं कहता हूं कि यह 'टेकनीक' अब पुरानी होगई, घिस गई। आज के खुशामद-पसंद इससे भलीभांति परिचित होगए हैं। अब हर समय, जी हुजूर, हां जी-हां, बहुत ठीक, वाह-वाह क्या कहने हैं, आदि पर रीझने वाले राजा-रईस, नवाब, शौकीन सब या तो परमधाम पहुंच गए या वहां की बाट जोह रहे हैं। आजकल के हम खुशामदियों का पाला पड़ता है उन पढ़े-लिखे मनोविज्ञान के जानने वालों से, जो स्वयं खुशामद कर-करके ही आज खुशामद कराने की स्थिति पर पहुंच सके हैं।

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