इसलिए हे नई दुनिया के नये खुशामदियों, आज के युग में भूलकर भी सीधे अपने आराध्य देव की प्रशंसा न करो। इस संबंध में मेरा पहला गुर याद रखो कि उनकी प्रशंसा नहीं, उनसे संबंधित चीजों की प्रशंसा करनी चाहिए। हमें उनकी रुचियों का अध्ययन करना चाहिए। हमें ध्यान से पहले यह देखना चाहिए कि उनके कमरे में चित्र कैसे लगे हैं, मूर्तियां किसकी हैं, वह सिगरेट कौन-सी पीते हैं, सिनेमा कैसा पसंद करते हैं, साहित्य कैसा पढ़ते हैं, कपड़े कैसे पहनते हैं, और फिर स्वयं उनकी प्रशंसा न करके आप उनकी चीजों की प्रशंसा कीजिए, उनकी रुचियों की सराहना कीजिए और भले ही कवियों की अतिशयोक्ति का भी उल्लंघन करते हुए कहिए-वाह ! क्या पांवपोश आपने चुनकर रखा है। इस पर पैर पोंछने के बजाय मुंह रगड़ने को मन ललचा आया ! और कहिए-वाह ! क्या सिगार आप पीते हैं कि दूर से ही सुगंध पाकर तबीयत हरी हो जाती है !
अपने अफसर से कभी भूलकर भी यह न कहिए कि हुजूर ज़रा तो खुशामद मान जाइए। इससे काम बनता होगा तो बिगड़ जाएगा। इस संबंध में मेरा दूसरा सूत्र याद रखिए और उनसे कहिए-सरकार आपसे पहले अफसर तो खुशामद से पिघल जाया करते थे, लेकिन आपके यहां तो खुशामद से भी काम नहीं चलता। फिर देखिए कि यह मक्खन कितना पौष्टिक साबित होता है !
खुशामद का तीसरा गुरुमंत्र यह है कि जिसकी खुशामद करनी हो, उसके निकट उसकी महत्ता और अपनी अज्ञता अवश्य प्रकाशित की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, उनकी मेज पर रखे फाउंटेनपैन को उठा लीजिए और कहिए-अरे, यह मॉडल बाजार में कब आया ? वाह, क्या खूब ! अजी, इसमें स्याही कैसे भरी जाती है ? आप देखेंगे कि मछली जाल में फंसी चली आ रही है।
 एक बार की बात है कि एक सज्जन से मुझे कुछ काम निकालना था। उनके बारे में सुन रखा था कि महाशय बड़े आदर्शवादी हैं। गज़ब के कट्टर हैं। खुशामदियों को ज़रा भी मुंह नहीं लगने देते। काम बहुत ज़रूरी था। मैंने उनके पास आना-जाना शुरू कर दिया। रोज नए-नए नुस्खों का व्यवहार करता। मगर वे सब खाली जाते। हैरान था कि क्या किया जाए ?
अंत में मालूम हुआ कि श्रीमानजी को 'होमियोपैथी' का शौक है। मैंने सोचा बस मैदान मार लिया। रोज़-रोज़ उनके पास नए मरीज ले जाता और हर दूसरे दिन उनके चंगे होने के समाचार पहुंचाता। कहता-डॉक्टर साहब, क्या जस है आपके हाथ में कि तीन खुराक लेते ही बीमार चारपाई से उठ खड़ा हुआ। आज तो वह अपने काम पर भी चला गया। उसके बच्चे डॉक्टर साहब, आपको बड़ी दुआएं दे रहे हैं। कभी कहता-यह 'केस' तो डाक्टर साहब आपने ऐसा ठीक किया है कि इसमें शहर के सारे डॉक्टर ना कर गए थे। कभी कहता- डॉक्टर, आप तो सब कुछ छोड़कर एक धर्मार्थ अस्पताल खोल लीजिए ! हजारों आत्माएं आपको दुआएं देंगी। गरज यह कि पंद्रह दिन के इस अचूक प्रयोग में डॉक्टर साहब वह सीधे हुए कि जितना मैं चाहता था उससे अधिक काम ही उन्होंने नहीं कर दिया, बल्कि समय-समय पर सदैव मुझे उपकृत करने को उत्सुक भी रहने लगे।
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