खुशामद भी एक कला है

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

कहते हैं कि सेवा से ही मेवा मिला करती है और लोग खुशामद के मार्ग में सेवा को बड़ा साधन बताया करते हैं। वह है भी। मगर उस तरह से नहीं, जिस तरह से लोग कहते हैं या करते हैं। यह ठीक है कि भरी सभा में चरण छूने से, रात को सोते समय हठपूर्वक उनके पैर दबाने से, बैरे की जगह खुद ही चाय बना लाने से आज के देवता इच्छित पदार्थों को दे दिया करते हैं। मगर ये तरीके पुराने हैं। इनमें (वैसे तो हम खुशामदियों के स्वाभिमान और आत्मा होती ही नहीं, मगर फिर भी) आत्मा बेचैन होती है। इसलिए आपको चाहिए कि आप मेरे मार्ग को अपनाएं। मतलब है कि आप बाबूजी की सेवा छोड़कर बीवीजी की सेवा में लग जाएं ? और बीवीजी का काम करते-करते अगर कहीं उनके बच्चे रोते-ठुनकते नज़र आएं तो पहले उन पर ध्यान दें। यह वह अमोघ अस्त्र है, जो कभी खाली नहीं जाता। बाबूजी की लाख काम न करने की इच्छा हो, मगर बीवीजी के कहे को कौन टाल सकता है।

उनकी तो क्या, उनके अग्रजों के भी बस से बाहर की बात है। और बीवीजी को प्रसन्न करने का गुर उनके बच्चे खिलाने से बढ़कर अब तक दूसरा कोई ईज़ाद नहीं हुआ।
इसलिए सुलझे हुए खुशामदी प्रायः पीछे के दरवाजे से ही प्रवेश प्राप्त किया करते हैं। इसमें कोई बुराई की बात नहीं। बाबा तुलसीदास ने भी अपनी 'विनयपत्रिका' आखिर सीताजी की मार्फत ही रामजी को पहुंचाई थी।
और बच्चे ! वे तो कार्य-सिद्धि की कुंजी है। सुनिए, जो काम थैलियों से नहीं होता, सिफारिशों से नहीं होता, वह चुटकियों में बच्चों के माध्यम से हो जाया करता है। उदाहरण के लिए, एक सज्जन आल इंडिया रेडियो में नौकरी के इच्छुक थे। दो साल तक पार्लियामेंट स्ट्रीट के चक्कर काटते-काटते कोई दो दर्जन जूते बदल चुके थे। एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने मुझे अपना दर्द कह सुनाया। मैंने कहा, अरे बावले ! क्यों अपनी कमाई बाटा कंपनी को बांट रहा है ? जा, फिरोजशाह रोड के अंत में जो नं........कोठी है, उसमें घुस जा और देख जाकर कि श्री-जी के बच्चे अपने पिताजी को क्या संबोधन करते हैं ? कहने की आवश्यकता नहीं कि वे सज्जन वहां गए और बच्चों की देखादेखी बाबूजी को दद्दा कहने लगे। परिणाम यह हुआ कि दद्दा-दद्दा कहते वह स्वयं सबके दद्दा बन बैठे।
यह भी हो सकता है-शिमले में एक जोड़े ने रिक्शा किराए पर ली और उस पर बैठकर चल दिया। रास्ते भर एक-दूसरे को 'डार्लिंग' कहकर न जाने वह क्या-क्या बातें करते रहे ? स्थान पर पहुंचकर जब बाबू ने कुली को पैसे दिए तो रिक्शेवाले ने अनुभव किया कि मज़दूरी कम दी जा रही है। उसने तपाक से श्रीमतीजी से अनुनय-भरे स्वर में कहा, "डार्लिंग, इतने से काम नहीं चलेगा, मेहनत देखकर दीजिए न ?''
इसके बाद की कल्पना आप स्वयं कर सकते हैं। इसलिए, मेरा कहना है कि बच्चों का अनुकरण अवश्य कीजिए, मगर बच्चों की तरह से नहीं, समझदारों की तरह से। क्योंकि खुशामद नासमझों के वश का रोग नहीं।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)

पृष्ठ-5

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1   2   3   4   5
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |