हे हिन्दी के आलोचको !

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

कहर मच जाए। मेरी कविता में जो गुण नहीं हैं, उन्हें खोज निकालो। पाठक जो सोच न सकें, वह लिख डालो। मैं तुम्हें रास्ता बताता हूं। तुमने आलोचना लिखने के लिए वे जो सौ-पचास शब्द डायरी में नोट कर मेज पर रख छोड़े हैं, मैं चाहता हूं कि तुम उन सबका एक बार ही मेरी पुस्तक पर प्रयोग कर बैठो। तुम लिखो- "व्यासजी अंग्रेजी के यह हैं और फ्रैंच के वह। रूस का अमुक लेख भाषा-सौष्ठव में उनसे यों पीछे रह जाता है और अमरीकी लेखक अपनी अश्लीलता के कारण हमारे व्यासजी का पल्ला यों नहीं पकड़ सकते।'' यही नहीं, तुम यह भी लिखो- "इधर पच्चीस वर्ष से हिन्दी में ऐसी दिलचस्प कोई दूसरी पुस्तक नहीं निकली। हम प्रत्येक हिन्दी पाठक का ध्यान इस पुस्तक की ओर आकृष्ट करना चाहते हैं।'' आप क्या हिन्दी के पाठकों की आदत से परिचित नहीं कि वे किसी भले आदमी की कद्र नहीं करते। भले न करें ! यदि हम आपस में संगठित हैं तो हमारा कर भी क्या सकेंगे ? आप मेरी कद्र कीजिए मैं आपको दाद दूंगा। मैं कवि ही नहीं, आलोचक भी हूं। आप मेरी प्रशंसा कीजिए, मैं मौका मिलते ही आपकी तारीफ़ के पुल बांध दूंगा। यदि कवि हैं तो व्यास और वाल्मीकि से भी बढ़ा दूंगा। यदि आप विचारक हैं तो बर्नार्ड शॉ और विनोबा से भी दस-हजार मील (आजकल के वायुयानी-युग में कदम क्या चीज है) आगे बढ़ा दूंगा- "मनतुरा काजी बिगोयम तो मरा हाजी बिगो।''
मित्रो ! मैं चाहता हूं कि तुममें से कुछ जान-बूझकर मेरे विरुद्ध लिखना शुरू कर दें। क्योंकि मुझे बताया गया है कि ये विरोधी आलोचनाएं प्रचार में बड़ी सहायक सिद्ध होती हैं। हां, तो बनारसीदास चतुर्वेदीजी, एक आंदोलन मेरे नाम पर भी सही। भाई रामविलास, मैं प्रगतिवादी नहीं हूं, एक तमाचा मेरे गाल पर भी। मेरी कविता के छंद-अलंकार और शब्दानुशासन, किशोरीदासजी कहां हो, तुम्हें पुकार रहे हैं। मैं कनवजिया नहीं हूं। मेरे पूर्वी मित्रो, कहां सो रहे हो ? तुम लिखते क्यों नहीं- "जिसे देखो आज वही कवि बनने जा रहा है। हास्य लिखना तो लोगों ने खिलौना समझ रखा है। अभी व्यास नाम के महाशय की एक पुस्तक देखने को मिली। लेखक अपने आपको न जाने क्या समझे बैठा है ! पर असल में ऐसे हास्य का नमूना हमें तो अन्यत्र दिखाई दिया नहीं। जनाब को पत्नी के सिवाय दूसरी चीजों में हास्य ही नहीं फूटता। कविताओं की टेकनीक एकदम पुरानी है और विचार हज़रत के सोलहवीं शताब्दी के। नारी को गलत चित्रित किया गया है। नारी को बदनाम करने की मिस मेयो जैसी प्रवृत्ति भी इस पुस्तक में दिखाई पड़ती है। ऐसा लगता है कि मिस्टर व्यास की अपनी विकृत भावना ही पत्नी के रूप में मुखर हो उठी है। अधिकांश कविताओं को पढ़कर लगा कि यह भारतीय घर का चित्र नहीं, स्वयं लेखक के अपने घर का पहलू है।
इन कविताओं में शैली की एकतानता है। सुरुचि, शिष्टता और सामाजिकता की अवहेलना की गई है। अधिकांश कविताएं अश्लील हैं। अभी पाश्चात्य देशों के मुकाबले हिन्दी साहित्य कितना तुच्छ और कितना नगण्य है कि उसकी तुलना नहीं की जा सकती। व्यास अगर अंग्रेजी नहीं जानते तो उन्हें अपने पड़ोसी बंगला-मराठी के साहित्य को ही देख लेना चाहिए। तब उन्हें अपना स्थान ठीक से दिखाई दे जाएगा कि जिनके पासंग में

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