हे हिन्दी के आलोचको !

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

उनकी रचनाएं कितनी फूहड़, कितनी बोदी और एकदम बेतुकी हैं।'' इसके बाद तुम आंख मूंदकर मेरी एक कविता को उठा लो और उसमें जगह-जगह छंद-भंग, पुनरावृत्ति, ग्राम्य प्रयोग और अश्लीलता की बारीकी से तलाश करो। प्रयत्न करने से बालू में भी तेल निकल आता है। पुस्तक के गेट-अप, कागज और मूल्य पर भी तुम्हारी टिप्पणी रहनी चाहिए। प्रेस की अशुद्धियों को बचा जाना सही आलोचना नहीं है और देखो, चलते-चलते मेरे प्रकाशक पर भी अपनी स्याही की दो बूंदें ऐसी छिड़कना कि अगली पुस्तक छापने से पहले उसे दस बार सोचना पड़ जाए। मतलब यह कि मेरी कविता को हर प्रकार से तुम्हें दो कौड़ी की सिद्ध करके ही दम लेना है, समझ गए न ?
यह मेरी पुस्तक है। मुझ पर बड़ी-बड़ी किताबें तो बाद में लिखी जाएंगी, पर कुछ छोटी पुस्तकें यदि अभी निकल जाएं तो कोई हर्ज़ न होगा। मतलब मेरे कहने का यह है कि यदि 'व्यास की कला' (गुप्तजी की कला) 'व्यास : एक अध्ययन' (साकेत : एक अध्ययन) जैसी किताबें अभी न लिखी जा सकें, तो जनाब प्रभाकर माचवे, तुम जल्दी से जल्दी दिल्ली चले आओ। मैं आजकल यहीं हूं। मुझसे आकर दो-चार 'इंटरव्यू' ले लो और जल्दी ही 'व्यास के विचार' (जैनेन्द्र के विचार) के नाम से एक पुस्तक तैयार कर दो। छपवाने का सब प्रबंध हो जाएगा।
और पाठको, मांगकर पुस्तक पढ़ने वाले साहित्य के शौकीनो और पुस्तकालयों में नवीन पुस्तकों की बाट देखने वाले चातको, कुछ कद्र करना सीखो। तुम्हारा शरीर अपना नहीं, राष्ट्र का है, और हम राष्ट्र का निर्माण करने वाले साहित्यिक हैं। तुम्हारा मन अपना नहीं, वह किसी और का है, और उस 'किसी और' की स्थापना तुम्हारे मन में हमने ही तो की है। तुम्हारा धन अपना नहीं, वह गरीबों का है, और हम हिन्दी के गरीब लेखक हैं। तुम्हारा ज्ञान अपना नहीं, वह हमसे उधार लिया हुआ है, आज हम इसकी एवज़ चाहते हैं। सबकी ओर से मैं चाहता हूं। तुम्हें यह कर्ज़ चुकाना ही होगा। अर्थात मेरी पुस्तक खरीदनी ही होगी। न केवल तुम किताब ही खरीदोगे, मेरी भूख कुछ और बढ़ी हुई है। मैं यश का भूखा हूं- मुझे कवि-सम्मेलनों का सभापति बनाओगे। मैं धन का भूखा हूं-मुझे लखटकिया पुरस्कार दिलाओगे। मुझे ज़िंदा रहने के लिए सोसायटी चाहिए। कविता लिखने के लिए रंगीनी चाहिए। बोलो दे सकोगे ? वाह रे कवि के स्वप्न ! और उसकी कविता की फज़ीहत ! और उसके ऊपर तैर आने वाला अहंकार ! और व्यंग्य रूप में उसकी अपनी ही आत्म-प्रशंसा !

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)


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