हिन्दी की होली तो हो ली

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

हैं, साइंस सीखते हैं और वह सब भी, जिनका सीखना पुराने घरों, गंदी गलियों और बेतरतीब बसे हुए शहरों में बड़े-बूढ़ों, पुरानी तहज़ीब से चिपटे, कब्र में पैर लटकाए लोगों के बीच मुमकिन नहीं।
इस बदल का असर सोसायटी में किस कदर हुआ है, उसकी बानगी बाजारों, होटलों, क्लबों, रेस्तराओं और कल्चरल शोज़ में बखूबी देखी जा सकती है। तेजी से बदलते हुए हिंदुस्तान की तस्वीर हेयर स्टाइलों और दाढ़ियों के कट-छंट से देखी जा सकती है। दाढ़ी फ्रेंच कट हुई और बुल्गानिन कट भी, अमरीकी कट भी और इंग्लिश कट भी। औरतों के बाल तो अब कमाल की काबिलियत से कटने लगे हैं। पुराने देहातीपन की निशानी धोती हिंदुस्तान से तेजी से भागी जा रही है। अचकन और शेरवानियों को अलविदा कह दिया गया है और टोपी गांधी बाबा के मरने के साथ ही उतार दी गई है। जब गांधीजी खुद टोपी नहीं पहनते थे, तो हम क्यों पहनें ? वह दिन दूर नहीं जब ग्रामवासियों में भी ग्राम, किलो, क्विंटल और किलोमीटर की तरह पूरे देश में पैंट और बुश्शर्ट का चलन आम हो जाएगा।
मगर सॉरी, हिंदुस्तानी औरतों ने अभी तक साड़ी का मोह नहीं छोड़ा है। भई पहनें इसे, लेकिन इसका नाम तो इंटरनेशनल कर दें। पेटीकोट, ब्लाउज, रिबन, लिपस्टिक और क्रीम-पाउडर की तरह साड़ी का भी तो अंतर्राष्ट्रीय नामकरण किया जा सकता है। ठीक वैसे, जैसे अंगूठी का रिंग, हार का नेकलेस, कर्णफूल का इयरिंग और बाजूबंद का आर्मलेट कर दिया गया। कपड़ों का, गहनों का पुराने नामों से और इनके पहनने से देहातीपन झलकता है। जब रसोई किचन होगई, खाने की मेज डाइनिंग टेबल होगई, बैठक ड्राइंगरूम होगई, सोने का कमरा बेडरूम होगया, नाश्ता ब्रेकफास्ट, दोपहर का भोजन लंच और रात का डिनर होगया तो बेलन ब्रेड-रोलर क्यों नहीं हो सकता ?
हमें अफसोस है कि लोग अंग्रेजी के गुण और गौरव को बिना समझे उसका विरोध करते हैं। क्या आपने कभी अंग्रेजी में किसी को गालियां दी हैं या किसी से खाई हैं ? कितना फोर्स होता है उनमें ! ब्लडी, नॉनसेंस, रासकल के वज़न के शब्द हिन्दी में हैं ?
किसी कहने वाले ने सच कहा है कि सत्यनारायण की कथा तो हिन्दी में अच्छी लगती है और गालियां देने का मज़ा अंग्रेजी में ही है। उन्हें जो समझा वह भी मरा और न समझा वह भी मरा ! गालियों को छोड़िए, अध्यात्म को लीजिए। डॉ0 राधाकृष्णन ने कितनी बढ़िया अंग्रेजी में भारतीय दर्शन को विवेचित, सॉरी एनालाइज़ किया है। अब आप ही बताइए कि यदि रवीन्द्रनाथ टैगोर गीतांजलि का अनुवाद अंग्रेजी में नहीं करते तो क्या वे विश्व-कवि बनते या नोबेल पुरस्कार पाते ? यह तो आपको पता ही नहीं है कि भारत से अंग्रेज हिन्दुस्तानियों की ताकत के बल पर नहीं गए, वे तो श्रीमती सरोजिनी नायडू की बढ़िया अंग्रेजी की तकरीरों से और गांधीजी के ठोस गूढ़ लेखों और अंग्रेजी तर्कों से तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी के लिए तैयार किए नेहरूजी के सारगर्भित अंग्रेजी प्रस्तावों से भागे हैं। इसीलिए तो हमारे अफसर और नेता टूटी-फूटी और ग़लत ही सही, अंग्रेजी बोलते और लिखते नहीं सकुचाते। जब वाल्मीकि मरा-मरा जपकर रामायण लिखने के काबिल होगए तो आज के अंग्रेजीदां लोगों को नाकाबिल कैसे कह सकते हैं ? सवाल अंग्रेजी का उतना नहीं है, जितना अंग्रेजियत का है। अंग्रेजियत आदमी को आला इंसान, आला अफसर, ऊंचा डिप्लोमेट और बड़ा व्यापारी बनाती है। हिंदुस्तान के व्यापारी मूर्ख नहीं हैं। वे खुद अंग्रेजी न जान तो इससे क्या हुआ,


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