कूड़ेमल, घसीटाराम आदि सब अपने बच्चों के जन्मदिन पर, मुंडन
और कनछेदन पर, विवाह पर अपने मित्रों और सगे-संबंधियों को अंग्रेजी में 'इनवाइट' करते हैं। तभी तो उनका व्यापार छलांगें मार रहा है। हमें शुक्रगुज़ार होना चाहिए उन किशोर-किशोरियों का, उन प्रौढ़-प्रौढ़ाओं का, उन छड़ों-बछड़ों और सांडों का जो घर-बाजार, बस और रेल, शिप और प्लेन, यानी देश और विदेश में परस्पर अंग्रेजी बोलकर दुनिया को यह अहसास दिलाते हैं कि प्रगति की रफ्तार में हम किसी से पीछे नहीं हैं। कुछ सिरफिरे हिन्दी के लोग जो यह दलील दिया करते हैं कि जर्मनी, फ्रांस, इटली, चैकोस्लोवाकिया, पोलेंड, हंगरी और जापान में लोग अंग्रेजी नहीं जानते। अपने इसी अज्ञान के कारण तो ये देश सैकिंड वर्ल्ड वार में हार गए। दक्षिण अफ्रीका के सभी लोग पढ़ गए होते और अंग्रेजियत को स्वीकार, यानी एक्सेप्ट कर लिया होता तो ऐसा खून-खराबा नहीं होता। चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य से बढ़कर देशभक्त, विद्वान और राजनीतिज्ञ कौन हुआ ? वे भारत को आने वाली मुसीबतों से बचाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजी का प्रचार किया। हर्ष की बात है कि राजाजी की बात हम इंडियंस के गले में अच्छी तरह उतर गई, इसलिए आजकल के फादर अपने बच्चों को होनहार बनाने के लिए उन्हें पंखा दिखाकर कहते हैं- बोलो, बोलो-फैन। बिजली की रोशनी दिखाकर कहते हैं- 'लाइट'। बंदर की तस्वीर दिखाकर कहते हैं- बोलो-मंकी। गधे को गधा क्या कहना, कहो-डंकी। ओलम और बारहखड़ी, पहाड़ा और भिन्न भी कोई सीखने की चीजें हैं। उन्हें शुरू से ही वन, टू, थ्री तथा टू टू जा फोर, टू थ्री जा सिक्स सिखाते हैं। बताइए बड़े होकर बाप का और देश का नाम ये ऊंचा करेंगे या वे जिनको शुरू से ही यह सिखा दिया जाता है-ओना मासी धम, बाप पढ़े न हम।
हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिए। अन्न बढ़ता है इरीगेशन यानी सिंचाई से और ज्ञान बढ़ता है अंग्रेजी पढ़ाई से। हिंदुस्तानियों की समझ में जितनी जल्दी यह बात आ जाए, उतना अच्छा है। संस्कृति और संस्कृत क्या बला है, यह हमारी समझ में आज तक नहीं आया। हिंदुस्तान और कब तक पोंगापंथी पंडितों, झाड़-फूंक करने वाले ओझाओं, मीन-मेख निकालने वाले ज्योतिषियों के चक्कर में फंसा रहेगा ?
आप ही बताइए कि नक्षत्र शब्द कॉमन है या स्टार ? भाग्य के पीछे कब तक भागते रहेंगे, अब 'लक' को आज़माइए। रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्र और शनिवार ज्यादा आमफ़हम हैं या संडे, मंडे...? यह तो अच्छा ही हुआ कि सरकारी मशीनरी में ढाले हुए शब्द रूपी सिक्कों को जनता ने नामंजूर कर दिया, वह टेलीफोन को टेलीफोन ही कहती है, दूरभाष नहीं। टेलीविज़न को टी.वी. कहती है, दूरदर्शन नहीं। सड़क को 'रोड' ही कहती है, मार्ग या पथ नहीं। पुस्तक को 'बुक' ही कहती है, पोथी या किताब नहीं। न्यूज़पेपर को अख़बार नहीं, पेपर कहकर ही खरीदती है। आप ही बताइए कि कलम या लेखनी शब्द एप्रोप्रिएट है या पेन। कलम से तो ऐसा लगता है कि जैसे यह विचारों का सर कलम करने वाली कोई चीज है। और लेखनी तो देखनी भी पसंद नहीं। आज के लेखक को अगर वह फाउंटेन पेन से लिखता है, तो उसे ऐसा अनुभव होता है, जैसे उसके विचार फाउंटेन की तरह ऊंचे-से-ऊंचे उठकर बुलंदियों को छू रहे हैं और उसकी फुहारें नीचे गिर-गिरकर एटमॉसफियर को ही कोल्ड नहीं, बल्कि लेखक को भी कोल्ड बना रही हैं। भारत में तो हम और हमारे पुरखे हजारों वर्ष रह लिए, लेकिन हमारा रंग काला ही रहा। हम काले, हमारे राम-कृष्ण काले, हमारे ऋषि-मुनि और उनके मुखिया ब्लैक द्वीप वाले, आई मीन कृष्ण द्वैपायन, यानी व्यासजी भी काले
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