हिन्दी की होली तो हो ली

( व्यासजी के व्यंग्य लेख )  

भूमिका
अगर गधे के सिर पर सींग होते ?
खुदा ने गंजों को नाखून दिये होते ?
झूठ बराबर तप नहीं
व्यंग्य पर व्यंग्य
ठंड : आजादी : समाजवाद
खुशामद भी एक कला है
माफ़ कीजिये
हे हिन्दी के आलोचको !
हिन्दी की होली तो हो ली
अगर ताजमहल में अस्पताल बन गया होता
दुनिया के पतियो एक हो जाओ
यदि कृष्ण आज मथुरा पधारते
अगर कविता में 'माने' न होते
कौन कहता है मुझे दिखाई नहीं देता
रहीम की कहानी : उनके मज़ार की जुबानी
नये साहित्य का नवीनतम काल-विभाजन
मेरी पत्नी भली तो हैं, लेकिन......
पत्नी एक समस्या
नारदजी को व्यासजी का नमस्कार !(दैनिक हिन्दुस्तान से)

थे। केवल कश्मीर के लोगों का रंग गोरा है, इसलिए संसार के बड़े-बड़े देश इसे भारत से अलग करना चाहते हैं। पिछले 50 वर्षों में हमने दल-बदल की ही ट्रेनिंग नहीं ली,रंग
बदलने के लिए भी कम एफर्ट्‌स नहीं किए गए हैं। कम-से-कम उत्तर भारत में तो रंग बदलने के लिए नए-नए एक्सपैरीमेंट किए जाते रहे हैं और उनमें भारतीयों को सफलता भी मिली है। लेकिन यह पूर्ण सफल तब हो सकता है, जबकि हम अपने आपको अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में पूरी तरह मिला लें। केवल लिबास बदलने से काम नहीं चलेगा,इसके लिए हमें खून भी बदलना पड़ेगा ! तभी हम प्राचीनता के मिथ्या गर्व से, पुरातत्व के उजड़े हुए खंडहरों के मोह से और झूठी-सच्ची कहानियों से भरे इतिहास के माया-जाल से मुक्ति पा सकते हैं। अपने को मिटाकर ही हम कुछ एचीव कर सकते हैं। विश्व मानवता के विकास की ज़िम्मेदारी अब केवल हिंदुस्तान पर ही है। वह संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, बंगला, मराठी और दक्षिण की भाषाओं के पढ़ने से पूरी नहीं हो सकती। इनको पढ़ने से हम फिर पीछे की ओर लौटेंगे। इसलिए अंग्रेजी को सहभाषा के पद से उठाकर शीघ्र से शीघ्र राष्ट्रभाषा और राजभाषा के पद पर एस्टेब्लिश कर देना चाहिए। भले ही इसके लिए कांस्टीट्यूशन में चेंज करना पड़े। भले ही इसके लिए ज़ोर-ज़बरदस्ती ही करनी पड़े। क्योंकि देश की उत्तर-दक्षिण की समस्या को हल करने का यही रास्ता है। हर्ष की बात है कि हमारे नेताओं ने राष्ट्र की एकता के इस मूलमंत्र को अच्छी तरह समझ लिया है। अब मोशनल नहीं, इमोशनल इंटीग्रेशन चाहिए। इस महान कार्य को केवल अंग्रेजी ही कर सकती है।
आप सोचिए- स्वराज हमें किसने दिलाया है ? क्या अंग्रेजी पढ़े-लिखों ने नहीं ? गांधी, नेहरू, सुभाषचंद्र बोस यदि विदेशों में जाकर अंग्रेजी न पढ़े होते तो मुल्क को फ्रीडम मिलती ? जिस भाषा ने संसार से हमारा इंट्रोडक्शन कराया, जिसके कारण ज्ञान-विज्ञान के हमारे लिए दरवाजे खुले, जिसके कारण हम दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता और मद्रास को लंदन, वाशिंगटन और पेरिस बना सके, उस महान मुंहलगी जुबान को हम छोड़ दें, तो हमारे जैसा कृतघ्न कौन होगा ? इस कृतघ्न शब्द को ही ले लीजिए, इसे हिंदुस्तान के कितने लोग समझते हैं ? केवल काशी और प्रयाग के मुट्ठीभर लोग या यूनिवर्सिटियों में हिन्दी पढ़ाने वाले कुछ दर्जन हिन्दी के लेक्चरर। ये सब देश को रिप्रजेंट नहीं करते। हिंदुस्तान तो सात लाख से भी अधिक गांवों में बसा हुआ है। किसी ग्रामवासी से कृतघ्न शब्द का अर्थ पूछ लीजिए। वह आपके मुंह की ओर ऐसे देखने लगेगा, जैसे उसे भद्दी गालियां दी जा रही हों। अगर हिंदुस्तान को उठाना है तो उसके गांवों को उठाना होगा। भारत के गांव हिन्दी या देशी भाषाओं के सहारे नहीं उठ सकते। वे तो अंग्रेजी से ही उठेंगे। हमें ग्रामवासियों को भी आरंभिक स्टेज से अंग्रेजी पढ़ानी होगी। संसार के वैज्ञानिकों को यह चुनौती है कि क्या वे प्लेग, टी.बी. और मलेरिया की तरह कोई ऐसा इंजेक्शन नहीं तैयार कर सकते, जिससे बच्चा पैदा होते ही अंग्रेजी बोलने लगे ? बिना अंग्रेजी के भारत का कल्याण नहीं, और बिना भारत के कल्याण के दुनिया का कल्याण नहीं। क्योंकि हिंदुस्तान ने दुनिया का ठेका ले लिया है, इसलिए उसे अंग्रेजी चलानी ही पड़ेगी।
हम अंग्रेजों को देश से निकाल सकते हैं, अंग्रेजी को नहीं। क्योंकि दासता, जिसका पवित्रतम अर्थ है 'भक्ति', इसलिए अंग्रेजी को मानसिक दासता न कहकर हम इसे विश्वात्मा की पवित्रतम भक्ति के रूप में अंगीकार करते हैं। लोग भले ही कहें कि हिंदुस्तानियों ने अंग्रेजी को अपनाकर अंग्रेजों की मानसिक दासता अभी तक बरकरार रख छोड़ी है, हम भले और हमारी भक्ति भली।

('व्यास के हास-परिहास' से, सन्‌ 1998)


पृष्ठ-4

| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
1   2   3   4
   | वेब निर्माण टीमः हैश नेटवर्क |