अब तक हिन्दी में साहित्य और उसके 'कारों' की बात की जाती रही है। संस्थानों के कार्यकलापों, प्रभावों के इतिहास के बारे में बात नहीं की जाती। की जानी चाहिए। हिन्दी एक बड़ी भाषा है। उसमें होने वाली हर गतिविधि का नक्शा बनाया जाना चाहिए। यहां पॉपुलर हिन्दी क्षेत्र है। इसे पढ़े-समझे बिना हिन्दी नहीं समझी जा सकती और हिन्दी क्षेत्र की सांस्कृतिक तस्वीर नहीं बनाई जा सकती।
कवि-सम्मेलनों के इतिहास को देखें तो ज्ञात होता है कि रीतिकालीन दरबारों से निकलकर कविता धीरे-धीरे आज़ादी के आंदोलन से जुड़ी और उससे जुड़कर ही वह 'मंचीय' बनी। तब 'लिखित कविता' करने वाले और 'मंचीय' करने वालों में भेद नहीं था। निराला, पंत, महादेवी, बच्चन सब लिखते भी थे, पढ़ते भी थे। प्रगतिवादी आंदोलन के दौरान 'लिखित' और 'पठित' का भेद शुरू हुआ जो नई कविता के दौर में पक्का होगया। एक ओर 'ऐलीटिज्म़' रह गया, दूसरी ओर मंचीय कविता रह गई। दोनों में कोई संवाद-बहस नहीं रही। दोनों विपरीत होते गए। एक नए ब्राह्मण बन गए। दूसरे त्यज्य माने जाते रहे। साहित्य की, समीक्षा की किसी किताब में इन मंचीय कवियों का ज़िक्र नहीं होता। रामविलास शर्मा ने नीरज पर जरूर कुछ लिखा। मगर उन्होंने भी 'पॉपुलर तत्व' की नज़र से नहीं लिखा।
हिन्दी के मंचीय कवि-सम्मेलनों ने आज़ादी के संघर्ष के दौरान मंचीय कविता को एक ओर राष्ट्रवादी चेतना से, दूसरी ओर हास्य-व्यंग्य से जोड़ा। यह हिन्दी गद्य में आ रहे व्यंग्य-विनोद का काव्यात्मक विस्तार था। दरबारी वक्त के बाद कविता धीरे-धीरे राष्ट्रवाद और हास्य-व्यंग्य की ओर आई।
आज़ादी के बाद भी राष्ट्रवादी भाव खासकर युद्धों की स्थिति में, कभी-कभी अंधराष्ट्रवादी हुआ। लेकिन श्रृंगारकाल का श्रृंगार भाव किनारे हो लिया। प्रेम-गीतों ने जगह ली। बच्चन, नीरज इसी प्रेम-स्कूल के कवि रहे। मगर सबसे ज्य़ादा जगह हास्य-व्यंग्य के कवियों ने बनाई। व्यासजी इसी के संभवतः सबसे बड़े हस्ताक्षर रहे। उनकी सतत् हास्य-कविताओं में तब के मर्दवादी सत्तामूलक परिवार के भीतर स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर तमाम तरह के कटाक्ष मिलते हैं। कहीं-कहीं ये मर्दवादी होते हैं, मगर 'पत्नी को परमेश्वर मानो' या 'साली आधी घर वाली है' या 'साले-ससुर' संबंधी कविताएं हिन्दू परिवार के समूचे भावात्मक छेड़छाड़, लंपटता और मर्दवादी मज़ाकों को उजागर करती है। 'मेरे प्यारे सुकुमार गधे' या 'खर्राटे' शुद्ध हास्य है। उनके पास हास्य के अनंत तरीके हैं। विनोद-वक्रता है। 'सलवार चली, सलवार चली' एक पूरा सांस्कृतिक उपद्रव है। व्यास के पास बहुत कुछ है। जो हिन्दी भाषा की संचारात्मक ताकत को बढ़ाता है। उनका गद्य तक ऐसा है। अब ऐसे ढेरों कवि हैं। बहुत से फूहड़ भी हैं। मगर हिन्दी का जनक्षेत्र उसी तरह से फूहड़ है, जैसे बांग्ला का या मराठी का ऐसा जनक्षेत्र हो सकता है। जरूरत इस सांस्कृतिक और भाषाई क्षेत्र को समझने की है। व्यासजी का निधन इधर ध्यान खींचता है।
(डॉ0 सुधीश पचौरी, दैनिक हिन्दुस्तान, 18 जून, 2005)