कदम-कदम बढ़ाए जा

( भूमिकाएं )  

       
वीरकाव्यः मेरा मंतव्य

       

हिन्दी में वीरकाव्य का लेखन आदिकाल से ही प्रतिष्ठित रहा है। बल्कि यह कहना अधिक सही है कि हिन्दी-काव्य का उदय वीरगाथा काल से ही हुआ है। चंदवरदाई की रासो परंपरा का हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान है। इस धारा को महाकवि भूषण ने, सूदन ने और लाल ने आगे बढ़ाया है। श्री वियोगी हरि की 'वीर सतसई' तो देव पुरस्कार से पुरस्कृत भी हुई है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण का 'जयद्रथ-वध', श्री श्यामनारायण पांडेय की 'हल्दीघाटी' आदि पुस्तकें और दिनकर की 'रश्मिरथी' तथा 'परशुराम की प्रतीक्षा' हिन्दी-वीरकाव्य की उत्तमोत्तम कृतियां हैं। श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसीवाली रानी थी' कविता ने राष्ट्रीय वीर भावना को व्यापक रूप से देश में जाग्रत किया है। मेरी यह 'कदम-कदम बढ़ाए जा' पुस्तक भी उसी श्रृंखला की एक कड़ी है।
प्रस्तुत पुस्तक के संबंध में कुछ लिखने से पूर्व मेरा यह मंतव्य अनुचित नहीं होगा कि प्राचीन वीरकाव्य उस सामंती युग की देन है, जब भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंटा हुआ था और तत्कालीन राजा और सामंत अपने राज्यों का विस्तार करने या अपनी प्रेमिकाओं को प्राप्त करने के लिए खड्गहस्त हुआ करते थे और उनके आश्रित कवि अपने आश्रयदाताओं के शौर्य और युद्धों का प्रायः अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया करते थे। भारत तो तब भी एक था, परंतु ये युद्ध राष्ट्रीय एकता या उसकी रक्षा के लिए नहीं लड़े जाते थे। न इनका लक्ष्य राष्ट्रीय वीर भावना को जाग्रत करना होता था। जगनिक के आल्हा ने व्यापक लोकप्रियता अवश्य पाई। वह आज भी उत्तर भारत के हिन्दी-क्षेत्रों के गांव-गांव में गाया जाता है और निश्चिंत रूप से वीर भावना पैदा करता है। परंतु यह भी आल्हा-ऊदल के व्यक्तिगत पराक्रम की शौर्यगाथा है। इसे राष्ट्रीय वीरकाव्य की संज्ञा नहीं दी जा सकती। प्राचीन समय में जब ये वीरकाव्य रचे गए, तब 'राष्ट्रवाद' शब्द का प्रचलन भी नहीं हुआ था। राष्ट्र की सांस्कृतिक एकता तो तब भी पूरे देश में व्याप्त थी, पर हर राजा अपने राज्य को ही देश कहता था और जनता अपने राज्य के अलावा दूसरे राज्य को परदेस कहा करती थी। 'राष्ट्र' शब्द को महत्त्व तो उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में ही प्राप्त हुआ। उसका पहला जयघोष लोकमान्य तिलक के श्रीमुख से हुआ। महात्मा गांधी ने देशवासियों को राष्ट्रवाद के सूत्र में बांधकर स्वराज्य के लिए कठिन अहिंसक संग्राम छेड़ा। राष्ट्र स्वतंत्र हुआ। राष्ट्र की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए भारतीय रणबांकुरों ने अपनी जान की बाजी लगा दी। मेरी यह छोटी-सी कृति उसी राष्ट्रवाद की देन है।
| कॉपीराइट © 2007: हिन्दी भवन, नई दिल्ली |
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